Friday, October 17, 2014

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी : दीनदयाल शर्मा





















बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी : 
दीनदयाल शर्मा

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचन्द या टालस्टाय के बारे में 'कुछ' लिखना बड़ा आसान लगता है। क्योंकि उनके द्वारा लिखे गए के अलावा उनके बारे में लिखा गया भी बहुत पढ़ा जा चुका है। पर किसी उस व्यक्ति के बारे में लिखा हुआ कम पढ़ा गया हो पर हो वह सुपरिचित। अब यह समझ में ही नहीं आ रहा कि श्री दीनदयाल शर्मा को क्या माना जाए?बाल साहित्यकार, साहित्यकार, कवि, हँसोड़, पत्रकार या फिर केवल मित्र। यह निर्णय कर पाना काफी कठिन है कि उनका कौनसा रूप उल्लेखनीय है या वे हरफनमौला हैं। कुछ भी हो, उन्हें यदि साहित्य का आमिर खान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हिन्दी फिल्म  जगत ज्यादातर अभिनेता कद में लम्बे हैं, पर कद में छोटा होने पर भी आमिर खान अभिनय में कइयों से ऊंचे हैं। इसी तरह सामान्य कद काठी के श्री दीनदयाल शर्मा भीड़ में चाहे छिप जाएं, पर साहित्य जगत में अपना कद काफी ऊंचा कर चुके हैं। यहां उन्हें छिपाना अब संभव नहीं है।

उनके परिचय का दायरा भी लम्बा-चौड़ा है। देश में कहीं भी जाएं, जहां दो-चार कवि, लेखक जुड़ेगे, इनके परिचित मिल ही जाएंगे। कुछ साल पहले उदयपुर में एक सज्जन मिले। परिचय हुआ। उन्हें बताया कि संगरिया हनुमानगढ़ जिले में हैं तो वे चहके-हनुमानगढ़ में तो एक वे हैं जो डुक मार कर हँसाते हैं...दीनदयाल जी..।

दुनियाभर में पहलवान दूसरे को रुलाने के लिए घंूसा मारते हैं। एक दीनदयाल शर्मा ही हैं, जो दूसरों को हँसाने के लिए घूंसे  या राजस्थानी 'डुक' मारते हैं। कहने का मतलब है कि मंच से जिसने भी इनकी राजस्थानी कविताएं सुन ली हैं, वह इन्हें भूल नहीं सकते। अभी कुछ दिन पहले अलवर के श्री सुमतिकुमार जैन से बात हुई तो बोले आपके हनुमानगढ़ में तो हमारे परिचित हैं...। वे आगे कुछ बोले, इससे पहले ही मेरे मुँह से निकल गया-दीनदयाल शर्मा...। 

हां, बिल्कुल यही....।

जो वे बताने जा रहे थे। कभी-कभी लगता है हनुमानगढ़ को प्रसिद्धि भटनेर या घग्घर से नहीं बल्कि श्री दीनदयाल शर्मा से ज्यादा मिली है। अनजान व्यक्तियों से भी उन्हें सहजता से बात करते, उनसे घुलते-मिलते देखा गया है। गाड़ी में, बस में...खाली रस्मी परिचय नहीं, रचनात्मक। एक बार गाड़ी में उनके साथ स$फर करते हुए देखा कि अपरिचित से परिचित होते ही उन्होंने उसके हाथ में अपनी कोई किताब या टाबर टोल़ी का नया अंक थमा दिया। इस हिदायत के साथ कि खुद भी पढऩा और बच्चों को भी पढ़ाना। यदि दीनदयाल के बस्ते में दो किताब है तो समझिए, किताबें कैद में नहीं रहेंगी। उन्हें पाठक मिलेंगे। मेरे जैसे व्यक्ति के साथ श्री दीनदयाल बैठते हैं तो कितना अजीब लगता होगा। क्योंकि मैं किताबें बांटने में जितना कंजूस हूँ , वे उतने ही उदार।

जब भी किसी लेखक के बारे में अखबार में कोई सुसमाचार छपे और सुबह-सुबह ही लेखक, को 'मैसेज' का संकेत मिले तो सब समझ जाते हैं कि श्री दीनदयाल का बधाई संदेश है। इसलिए मजाक में यही कहा जाता है कि श्री दीनदयाल शर्मा रात में सोने से पहले 'अगले दिन' का दैनिक पढ़ लेते हैं और जागते ही मुँह धोने से पहले बधाई का एस.एम.एस. भेज देते हैं। इनकी यह सजगता और तत्परता लेखक और अखबार दोनों को निहाल कर देती है।

श्री दीनदयाल शर्मा को अभी तक टीवी के लाफ्टर शो में जाने का अवसर नहीं मिला है। इसलिए वे हमें और आपको हँसा कर अपनी इस कला का प्रदर्शन करते रहते हैं। अखबार में वर्गीकृत विज्ञापन की तरह वर्गीकृत लतीफों का भी उनके पास भंडार है। जैसे आप हैं, वैसा ही लतीफाबाण आपकी ओर आता दिखाई देगा। आपको नाक-भौं सिकोडऩे का मौका नहीं देंगे कि आप कहें-यह क्या सुना दिया। मर्यादा ही भंग कर दी। यही कारण है कि लड़कियों के कॉलेज में भी कन्याओं का मनोरंजन करने बुला लिए जाते हैं। स्टाफ निश्चित रहता है कि सीमारेखा का उल्लंघन नहीं होगा। आजकल तो पता नहीं, पहले तो $खुद दीनदयाल ही इसकी व्यवस्था करते थे। जब लड़कियों, महिलाओं की सभा में हास्य बिखेरने जाते थे, तब अद्र्धांगिनी श्रीमती कमलेश शर्मा को साथ ले जाते ताकि नियंत्रित रहें। ऐसा बताकर वे सरलता से स्वीकार करते रहे हैं कि उन पर बीवी का कंट्रोल है।

खैर, यह तो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की बात है। यदि उनके कृतित्व पर दृष्टिपात करें तो वह भी कम नहीं है। उनकी 'मैं उल्लू हूँ ' यह उनकी स्वीकारोक्ति नहीं, उनके व्यंग्य संग्रह का शीर्षक है। उनके व्यंग्य लेखन का पुख्ता प्रमाण है। बाल साहित्य में उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके कई बाल कथा संग्रह तो तभी छप गए थे जब आज के कई साहित्यकार शैशवास्था में थे। कवि के रूप में तो यही कहा जाएगा कि आज तक किसी मंच पर असफल नहीं हुए हैं। उनके लिए आमतौर पर 'एक और'... 'एक और'.... सुनाई देता है। क्षेत्र के कई साहित्यकारों को 'प्रकाशित' होने में उन्होंने संपादन-प्रकाशन मार्ग निर्देशन के क्षेत्र में अभूतपूर्व सहयोग दिया है। इनकी वजह से कइयों के हाथ में उनकी प्रकाशित कृतियां हैं। पर पत्रकारिता के क्षेत्र में टाबर टोल़ी उनका अभिनव प्रयोग है। 

राजस्थान से बाहर हिन्दी क्षेत्रों में उनके पाक्षिक का नाम कइयों को भ्रमित कर देता है, पर मैटर उन्हें हर्षित करता है। साहित्य और बाल साहित्य से जुड़े इस पाक्षिक को उनके धैर्य का प्रतीक कहा सकता है। गत सात वर्षों से निरंतर नियमित प्रकाशन, संपादन... वह भी साधन विहीनता की स्थिति में आश्चर्यचकित तो करता ही है। इसी उत्साह ने उन्हें एक बार कानिया मानिया कुर्र..नाम से राजस्थानी बाल अख़बार प्रकाशित करने की प्रेरणा हुई। पर तीनेक साल से आगे यह गाड़ी नहीं चली। काश...राजस्थानी अभियान के नेता आगे आते और एक नये नवेले राजस्थानी बाल अखबार को मरने न देते। खैर, कुछ भी हो, जीवन में अक्सर झंझावतों का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए, उनकी यह जिजीविषा बनी रहे, यही कामना है।                        

गोविंद शर्मा,  ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राजस्थान
1-15 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार "टाबर टोळी " से साभार

Saturday, September 1, 2012

'बाळपणै री बातां' र साहित्य अकादमी  का राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार


केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ओर से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार- 2012 के लिए मेरी राजस्थानी निबंध ( संस्मरण ) कृति   'बाळपणै री बातां' का चयन किया गया है। पुरस्कार स्वरूप ताम्रफल·, शॉल और पचास हजार रुपये की राशि नवंबर 2012 में अकादमी की ओर से आयोजित भव्य समारोह में प्रदान दिए जाएंगे।

Saturday, June 23, 2012



आओ आपां

मायड़ भासा राजस्थानी में

चोखी-चोखी रचनावां लिखां
अळगी-अळगी विधा में
नूंवै सूं नूंवै ढंग में लिखां
पछै सगळी भासावां में
आपां सै' सूं मोटा दिखां।


आपां आम आदमी नै बतावां
उणनै मानता री बात समझावां
आम आदमी कनै नीं है नेट
बीं रौ खाली पड़्यौ है पेट

आपां पेट री बात करां
आपां दुख बांटण री बात करां
आपां घर में बात करां
पाड़ौसी सूं बात करां
गळी मौहल्लै बात करां
आपां सै' सूं बात करां

मानता सारू आम आदमी है धूरी
इणनै जोडऩौ भौत ही जरूरी
आम आदमी दिरावै 'हार'
आम आदमी परावै 'हार'
आम आदमी आपां नै
सै' सूं अळगा मानै
पै'ली ओ भेद मिटावां
पछै भासा माथै आवां

आपां होवां एक
आपां नै कुण टोक सी
मानता देणी पड़सी
पछै कुण रोक सी।


दीनदयाल शर्मा 




Wednesday, May 9, 2012

Notice banam Rajasthan Patrika


22 October 2011 ki Rajasthan Patrika ke Lok katha stambh me meri ek baal kahani benaami chaap di..jabki ye meri maulik baal kahani hai..Patrika ko pahle E mail bhi bheja.. inhone apni galati bhi swikaar nhi ki..fir mene Vakeel ke madhyam se Patrika ko notice bhijwaya hai..Mujhe nyaay chahiye..Deendayal sharma

Monday, April 16, 2012

बाल मनोविज्ञान के चितेरे ...दीनदयाल शर्मा जी / डॉ॰ मोनिका शर्मा



बाल मनोविज्ञान के चितेरे ...दीनदयाल शर्मा जी 
दीनदयालजी की पुस्तकें 

बच्चों के मन को समझना और उनके लिए लिखना आसान नहीं होता  । बच्चों के मासूम  मन की और उनकी रूचि की सामग्री को शब्द देना लेखन की दुनिया में शायद सबसे कठिनतम काम है । मुझे बच्चों के मन को समझने और बाल साहित्य पढने में बहुत रूचि है । अबकी बार जब जयपुर जाना हुआ तो दीनदयालजी से बात हुयी और उनकी कुछ पुस्तकें मिली । काफी समय से सोच रही थी कि उनके बाल साहित्य को लेकर मैं अपने विचार आप सबके साथ साझा करूं। उनके ब्लॉग पर काफी समय से उनकी बाल रचनाएँ नियमित पढ़ती रूप से पढ़ती आई हूँ । ऐसे में उनकी पुस्तकें पढना और बाल मन को समझना मेरे लिए एक सुखद एवं सुंदर अनुभव रहा । 

बाल साहित्यकार  के रूप में दीनदयाल जी की सोच बच्चों के मन को गहराई  से समझने वाली है । मनोरंजन और रोचकता के साथ-साथ जीवन से जुड़ी सीधी सरल सीख उनके बाल साहित्य में परिलक्षित होती है । उनकी बाल कवितायेँ और कहानियां बच्चों में चेतना जागने के साथ ही बाल मन की जिज्ञासाओं को भी समेटे है । 

पापा मुझे बताओ बात 
कैसे बनाते दिन और रात 

और ढेर सी बातें मुझको 
समझ क्यों नहीं आती हैं 
न घर में बतलाता कोई 
न मेडम बतलाती है 

बच्चों के मन में रहने वाले द्वंद्व और प्रश्नों को उकेरे उनकी कई रचनाएँ प्रभावित करती हैं। उनकी रची कविताओं में कहीं पर्यावरण को बचाने की सीख है तो कहीं राष्ट्रप्रेम की प्यारी बातें । गंभीर हो या हास्य बाल मनोविज्ञान पर दीनदयालजी की पकड़ चकित करती है । उनकी पुस्तक 'इक्यावन बाल पहेलियाँ'  ऐसी बाल सुलभ समझ को दर्शाती है । 

बातों बातों में बच्चों को बहुत कुछ समझा देने वाली बाल पहेलियाँ सरल भाषा शैली में हैं और जानकारी से भरपूर भी । यह पुस्तक रोचक, ज्ञानवर्धक  और सशक्त बाल पहेलियाँ समेटे है ।  जैसे पेड़ और पुस्तक को लेकर उनकी रची ये बाल पहेलियाँ  । 

खड़ा खड़ा जो सेवा करता 
सबका जीवन दाता 
बिन जिसके न बादल आयें 
बोलो क्या कहलाता ?

दिखने में छोटी सी लगती
गज़ब भरा है ज्ञान 
पढ़कर इसको बन सकते हम 
बहुत बड़े विद्वान  

बच्चों के मन को समझते हुए ही उन्होंने अपनी पुस्तक 'कर दो बस्ता हल्का' में बाल मन को कहीं गहरे छुआ है । इन्हें पढ़ते हुए बरबस ही बड़ों के चेहरों पर भी मुस्कान आ जाती है । बच्चों का मासूम मन क्या चाहता है,  यह उनकी रचनाओं में प्रमुखता से झलकता है । 

मेरी मैडम 
मेरे सरजी 
हमें पढ़ाते 
बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा  जी 
अपनी मरजी

बस्ता भारी 
मन है भारी  
कर दो बस्ता हल्का 
मन हो जाये फुलका

राजस्थानी बाल साहित्य की दुनिया में भी दीनदयालजी एक जाना-माना नाम हैं  । हिंदी और राजस्थानी  दोनों ही भाषाओँ में पूरे अधिकार से बाल साहित्य रचते हैं । उनकी पुस्तक ' बाळपणै री बातां ' की लेखन शैली इसी बात का प्रमाण है । बाल मन को समझने वाली उनकी सोच उनके लेखन में साफ़ झलकती है । तभी तो उनकी रचनाओं में बालमन की चंचलता भी है और सब कुछ जान लेने की उत्सुकता भी । 'बाळपणै री बातां' पुस्तक हिंदी साहित्य अकादमी के पुरस्कार हेतु नामांकित भी हुई है । इस पुस्तक में स्कूल ,घर और अपने परिवेश से जुड़ी बच्चों के मन की बातों का लेखा जोखा है । इस  पुस्तक  में उन्होंने एक संवेदनशील पिता और बाल साहित्यकार के रूप में अपने बच्चों से के साथ हुए अनुभव और संवाद को साझा किया है । 

बच्चों और बाल साहित्य के प्रति उनके समर्पण इतना है कि वे टाबरटोली नाम का एक अख़बार भी निकालते हैं जो बच्चों के लिए निकलने वाला देश पहला अख़बार है । उनका  ब्लॉग बचपन  भी बच्चों को ही समर्पित है । 

दीनदयालजी की पुस्तकें पढ़कर यही लगा कि उनकी रचनाएँ बच्चों की रूचि-अरुचि और बाल मन की भाषाई समझ को ध्यान में रखकर रची गयीं हैं । उनकी  बाल सुलभ अभिव्यक्ति इतनी सहज एवं सरल है कि हर शब्द बच्चों की कलात्मक अभिवृत्तियों, जिज्ञासाओं और संवेदनाओं को उकेरता सा लगता है । 

Thursday, December 29, 2011

जय जय दीनदयाल जी


दीनदयाल जी

जय जय दीनदयाल जी,
आप, हृदय विशाल जी।
आपकी  महिमा बड़ी निराली,
रहे जगत को  पाल जी।।

सबका  रखें खयाल जी,
सबको करे, निहाल जी।
आपके  जैसा कौन भला है,
मिलती नहीं मिसाल जी।।

जय जय दीनदयाल जी,
जय जय दीनदयाल जी।।

-रामगोपाल राही
लाखेरी, जिला: बूंदी  राज.

Tuesday, October 4, 2011

बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा सम्मानित

राजस्थान साहित्य अकेडमी और बाल वाटिका की ओर से भीलवाड़ा में आयोजित बाल साहित्य संगोष्ठी एवं पुरुस्कार- सम्मान समारोह में हनुमानगढ़ के बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा को इनकी राजस्थानी बाल संस्मरण कृति " बाळपणे री बातां " के लिए श्री घीसूलाल सेन स्मृति बाल वाटिका पुरुस्कार प्रदान किया गया.. पुरुस्कार स्वरूप इन्हें 2500 रूपये नकद, अंग वस्त्र, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, श्री फल देकर एवं शाल ओढा कर सम्मानित किया गया..

02 Oct. 2011

Wednesday, September 28, 2011

Saturday, July 23, 2011

राजस्थानी बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा


दीनदयाल शर्मा , बाल साहित्यकार 

दीनदयाल शर्मा , बाल साहित्यकार

जन्म: 15 जुलाई 1956 (प्रमाण पत्र के अनुसार) जन्म स्थान: गांव- जसाना, तहसील- नोहर, जिला- हनुमानगढ़ (राज.) शिक्षा: एम. कॉम. (व्यावसायिक प्रशासन, 1981), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर 1985), स्काउट मास्टर बेसिक कोर्स (1979, 1990) लेखन: हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में 1975 से सतत सृजन। मूल विधा: बाल साहित्य अन्य: व्यंग्य, कथा, कविता, नाटक, एकांकी, रूपक, सामयिक वार्ता आदि। विशेष: =हिन्दी व राजस्थानी में दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। =देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित (1975 से) =महामहिम राष्ट्रपति डॉ. कलाम द्वारा अंग्रेजी में अनुदित बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण। =बाल दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की ओर से विशेष सम्मान, 2007 =आकाशवाणी से हास्य व्यंग्य, कहानी, कविता, रूपक, नाटक आदि प्रसारित। =दूरदर्शन से साक्षात्कार एवं कविताएं प्रसारित। =काव्य गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ।=गंगानगर पत्रिका (1972 से) प्रताप केसरी (23 अप्रेल 1979 से) और राजस्थान पत्रिका के लिए समाचार संकलन (1972 से 1982 के मध्य)=राष्ट्रदूत, बीकानेर, प्रताप केसरी, श्रीगंगानगर, दैनिक तेज, हनुमानगढ, और दैनिक तेज केसरी, हनुमानगढ़ के लिए स्तंभ लेखन। (1979 से 1982 के मध्य) =बी.जे.एस.रामपुरिया जैन महाविद्यालय, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1979=जैन पी.जी.कॉलेज, गंगाशहर, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1981=संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, हनुमानगढ़, राज., 1986 =संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़, राज. 1984=साहित्य सम्पादक (मानद): टाबर टोल़ी पाक्षिक (बच्चों का हिन्दी अखबार), बाल दिवस 2003 से लगातार=सम्पादक (मानद): कानिया मानिया कुर्र (बच्चों का राजस्थानी अखबार) =डॉ. प्रभाकर माचवे : सौ दृष्टिकोण में एक आलेख संकलित।=शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशनों में रचनाएं प्रकाशित। =स्कूल एवं कॉलेज की अनेक स्मारिकाओं का सम्पादन।=बाल साहित्य की अनेक पुस्तकों के भूमिका लेखक। =जिला साक्षरता समिति हनुमानगढ़ की ओर से प्रकाशित मासिक मुख पत्र आखर भटनेर का सम्पादन। साक्षरता में उपलब्धियां : =जिला संपूर्ण साक्षरता समिति हनुमानगढ़ के 'भटनेर' परियोजना प्रस्ताव, =उत्तर साक्षरता परियोजना प्रस्ताव तथा सतत् शिक्षा परियोजना प्रस्ताव का निर्माण, लेखन और संपादन, =नवसाक्षरों के पठन हेतु 'आखर मेड़ी' भाग-1, भाग-2, भाग-3 का निर्माण - सम्पादन, =संदर्भ व्यक्ति, =मीडिया सैल एवं =कौर ग्रुप का सदस्य, =आखर गांव, =आखर राजस्थान तथा =नीले घोड़े का असवार नाम की तीन भित्ति पत्रिकाओं का निर्माण, =समय-समय पर तहसील, जिला एवं राज्य स्तरीय कार्यशालाओं तथा कला जत्थे में सक्रिय भागीदारी। =जिला साक्षरता समिति की ओर से मासिक मुख पत्र 'आखर भटनेर' का कई वर्षों तक सफल संपादन। प्रकाशित कृतियां: (हिन्दी में) =चिंटू-पिंटू की सूझ (बाल कहानियां चार संस्करण)=चमत्कारी चूर्ण (बाल कहानियां) =पापा झूठ नहीं बोलते (बाल कहानियां)=कर दो बस्ता हल्का (बाल काव्य)=सूरज एक सितारा है (बाल काव्य)=सपने (बाल एकांकी)=बड़ों के बचपन की कहानियां (महापुरुषों की प्रेरणाप्रद घटनाएं)=इक्यावन बाल पहेलियाँ (बाल पहेलियां)=फैसला (बाल नाटक)=नानी तू है कैसी नानी=चूं-चूं (शिशु कविताएँ)=राजस्थानी बाल साहित्य:एक दृष्टि=फैसला बदल गया (नवसाक्षर साहित्य) =मैं उल्लू हूं (हास्य व्यंग्य दो संस्करण 1987,1993) =सारी खुदाई एक तरफ (हास्य व्यंग्य संग्रह) (अंग्रेजी में) =द ड्रीम्स, राजस्थानी साहित्य:=चन्दर री चतराई (बाल कहानियां)=टाबर टोल़ी (बाल कहानियां) =शंखेसर रा सींग (बाल नाटक, दो संस्करण)=तूं कांईं बणसी (बाल एकांकी)=म्हारा गुरुजी (बाल एकांकी)=डुक पच्चीसी (हास्य काव्य) =गिदगिदी (हास्य काव्य) =सुणौ के स्याणौ (हास्य काव्य, दो संस्करण)=स्यांति (कथा)=घर बिगाड़ै गुस्सौ (हास्य)=घणी स्याणप (हास्य)=बात रा दाम (तीन बाल नाटक)=बाळपणै री बातां प्रसारित रेडियो नाटक: =मेरा कसूर क्या है=रिश्तों का मोल =अंधेरे की तस्वीर=पगली=और थाली बज उठी =अपने-अपने सुख =जंग जारी है =उसकी सजा =छोटी-छोटी बातें=और सब कहते रहे =पगड़ी की लाज=मुझे माफ कर दो =घर की रोशनी प्रसारित झलकी: =मास्टर फकीरचंद =चक्कर =गोलमाल प्रसारित बाल नाटक: =फैसला =शंखेश्वर के सींग =परीक्षा =बिगड़ग्यौ बबलू =म्हारा गुरुजी प्रसारित रूपक: =सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता: कालीबंगा मंचित नाटक : =बात रा दाम =जै]रीली नागण : शराब =म्हारा गुरुजी =बिगड़ग्यौ बबलू =मास्टर फकीरचंद =सैं' संू बड़ी पढाई =तंू कांईं बणसी पुरस्कार और सम्मान : =राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से हिन्दी बाल कथा संग्रह पर डॉ.शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार (1988-89) =राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से राजस्थानी बाल नाटक पर पं. जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार (1998-99) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर (उत्तरप्रदेश) की ओर से बाल साहित्य सम्मान, 1998 =हिन्दी बाल कथा पर अखिल भारतीय शकुन्तला सिरोठिया बाल कहानी पुरस्कार, इलाहाबाद (2000) =राष्ट्रीय बाल साहित्य समारोह, चित्तौडगढ़़ से राजस्थानी बाल एकांकी पर चंद्रसिंह बिरकाली राजस्थानी बाल साहित्य का प्रथम पुरस्कार (1998-99) =हिन्दी बाल कथा पर कमला चौहान स्मृति ट्रस्ट, देहरादून (उत्तरांचल) की ओर से सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्यकार पुरस्कार (2001) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं पर अखिल भारतीय साहित्य एवं कला विकास मंच, रावतसर (1999) से सार्वजनिक सम्मान। =पंडित भूपनारायण दीक्षित बाल साहित्य पुरस्कार, हरदोई, उत्तरप्रदेश (1998-99) =नागरी बाल साहित्य संस्थान, बलिया, उत्तरप्रदेश से सम्मान (1998-99) =पं. हरप्रसाद पाठक स्मृति बाल संस्थान, कानपुर से सम्मान (1998-99) =रूचिर साहित्य समिति, सोजतशहर, पाली, राज. की ओर से बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सार्वजनिक सम्मान (1998-99) =ग्राम पंचायत, जण्डावाली, हनुमानगढ़, राज., (1997) नगर परिषद्, हनुमानगढ़ (1989) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ (1998) की ओर से सार्वजनिक सम्मान। =रोवर स्काउट (सेवा कार्य / साइकिल हाइक) में राज्य स्तरीय पुरस्कार (1979) =महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान कविता, कहानी, कार्टून, एकाभिनय, श्रेष्ठ हस्तलेखन व कुश्ती प्रतियोगिता में प्रथम / द्वितीय =अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर राज्य में सर्वाधिक पुस्तक दानदाता के राज्य स्तरीय पुरस्कार से बिड़ला सभागार, जयपुर में सार्वजनिक सम्मान (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान ब्राह्मण महासभा की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2009) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2009) =सृजनशील बाल साहित्य रचनाकारों की राष्ट्रीय संस्था 'बाल चेतना', जयपुर की ओर से राजस्थानी बाल साहित्य की सेवाओं के लिए 'सीतादेवी अखिल भारतीय श्रीवास्तव सम्मान' (2006) =राजस्थानी बाल साहित्यिक सेवाओं के लिए प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2010) संपकर्: 10/22, आर.एच.बी. कॉलोनी, हनुमानगढ़ जं., पिन कोड- 335512, राजस्थान, भारत मोबाइल - 09414514666

Thursday, April 7, 2011

Hasy kavi Deendayal Sharma

Deendayal Sharma, 
Hanumangarh Jn. 335512
10/22 Housingh Board Colony, HMH

Mob. 094145 14666, 095095 42303

Tuesday, April 5, 2011

Deendayal Sharma & Rajendra Daal

Deendayal Sharma & Rajendra Daal
मेरा जन्म दिन : चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया विक्रम सम्वत 2013 यानी गणगौर पर्व पर मेरा जन्म दिन है..अंग्रेजी तारिख के हिसाब से इस बार मेरा जन्म दिन 6 अप्रैल 2011 वार बुधवार को आ रहा है.. http://deendayalsharma.blogspot.com ,
Mob. 9414514666

Tuesday, March 29, 2011

मेरी नज़र में : दीनदयाल शर्मा

दीनदयाल शर्मा की नवीन कृति का सदैव इन्तज़ार रहता है।
 बाल साहित्य नाम सुनते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐ ऐसा साहित्य जो बालमन, बाल मस्तिष्क एवं बाल हृदय के अनुरूप लिखा जाता हो। कहने को तो भारतभूमि में बाल साहित्यकारों की बाढ़ आयी है। आज की स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि हर कोई बाल साहित्य रूपी मन्दाकिनी में प्रविष्ठ होना चाहता हे।
    
इस सन्दर्भ में अच्छी बात यह है कि इससे बालसाहित्य की लोकप्रियता का आभास होता है। वर्तमान युग में बालसाहित्य काफी चर्चित एवं लोकप्रिय हुआ है। किन्तु बुरी बात हयह है कि हर कोई कलम कागज के साथ बाल साहित्य में अपनी सहभागिता निभाने के लिए उतावला हो रहा है।  यही कारण है कि बालसाहित्य जिस स्तर का आना चाहिए वह स्तर नहीं बन पा रहा है, इससे बाल साहित्य के अग्रणी पुरोधाओं के लिए चिन्तित होना स्वाभाविक है। उन अग्रणी बालसाहित्यकारों में एक नाम हनुमानगढ़ के दीनदयाल शर्मा का है।
    
श्री शर्मा लम्बे समय से बालसाहित्य की सेवा कर रहे हैं। कई संगोष्ठियां, सम्मेलनों एवं कॉन्फ्रें सों में उन्हें सुनने को मिला है। जिससे उनकी खूबियों का अहसास हुआ है।  श्री शर्मा बच्चों के लिए लिखते हैं तो बाल मन, बाल मस्तिष्क एवं बाल हृदय को मानो आत्मसात कर लेते हों। लोग कहते हैं बच्चों के लिए लिखने में क्या है? संभवत: ऐसे कथन एवं ऐसे लोगों द्वारा सचेत बालसाहित्य ही बालसाहित्य जगत के खण्डित कर रहे हैं।
    
बिना बालमनोविज्ञान को समझे बच्चों के लिए लिखना हवा में तीर चलाने जैसा है। श्री शर्मा की खूबी है कि वे बच्चों के लिए लिखते समय बच्चा बनकर ही सोचते हैं और उस चिन्तन से बच्चों के अनुसार शब्द देकर बाल साहित्य का सृजन करते हैं। हम सभी जानते हैं कि बालक का हृदय मोम की तरह होता है उसे जैसा चाहें पिघला सकते हैं।  अत: ऐसे मुलायम हृदय पर प्रहार करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए अपितु उस पर मरहम लगाने की कोशिश होनी चाहिए। यों तो श्री शर्मा जी बालमन एवं बाल हृदय को समझकर उनके अनुरूप ही बाल साहित्य का सृजन करते हैं किन्तु उनकी एक विलक्षण खूबी है कि वे उसे अन्तिम रूप देने के पूर्व 25-50 बच्चों को सुनाकर तब अन्तिम रूप देते हैं। यह खूबी ..........बाल साहित्यकारों में ही दृष्टव्य है उनमें श्री शर्मा जी अग्रणी है। यही कारण है कि उनकी बाल कविताएं, क्षणिकाएं, कहानियां बच्चे बड़े चाव से पढ़ते हैं। प्रत्येक कवि एवं लेखक की यह आचार संहिता होनी चाहिए कि वह जिसके लिए लिख रहा है उस रचना को अन्तिम रूप देने के पूर्व उस वर्ग से सन्तुष्ट हो लें। इसके लिए शर्मा जी को आदर्श माना जाता है। उनकी इसी खूबी के कारण उनकी रचनाओं के पाठक अच्छी संख्या में हैं और उन्हें उनकी नवीन कृति का सदैव इन्तज़ार रहता है। यह स्थिति किसी भी लेखक के लिए सुखद कही जा सकती है।
    
श्री शर्मा जी बालसाहित्य के स्तर को बढ़ाने की दृष्टि से एक पथ टाबर टोल़ी भी निकाल रहे हैं जिसके माध्यम से समय-समय पर बालसाहित्यकारों को स्तरीय साहित्य परोसने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। अपने इस पथ के माध्यम से बच्चों की सृजन क्षमता को वृद्धिंभत करते हुए उन्हें लिखने के लिए एक प्लेटफार्म भी देते हैं। टाबर टोल़ी में प्राय: बच्चों की रचनाएं देखकर प्रसन्नता होती है और हृदय बाग-बाग होकर कह उठता है- 'धन्य हैं आप और धन्य है आपकी सेवाएं ।'
       
आप बालसाहित्य की सेवा कई दृष्टियों से कर रहे हैं। बाल साहित्य की अनेकानेक विधाओं पर लेखनी चलाकर जहां बच्चों के लिए उपयोगी सामग्री परोस रहे हैं, वहीं अनेकानेक बाल पत्रिकाएं आपकी रचनाओं से समृद्ध हो रही हैं तथा  अनेक पुस्तकों का सृजन कर बालसाहित्य को समृद्ध किया है। बालपत्रिका निकालकर अपने बच्चों की सृजनशीलता को बढ़ावा देने का कार्य भी आप अनवरत कर रहे हैं। यही नहीं अच्छे बालसाहित्य को प्रकाशक बनकर प्रकाशित करने का कार्य भी निरन्तर कर रहे हैं। यही नहीं स्थान-स्थान पर भ्रमण कर बालसाहित्य की दशा एवं दिशा से लोगों को जागरुक भी कर रहे हैं तथा बाल साहित्य का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। एक व्यक्ति किन्तु बाल साहित्य के क्षेत्र में उसके विराट एवं बहुविध कृतित्व को देख अन्तर्मन उल्लासित हो उठता है और बधाई देने के लिए प्रेरित होता है। अत: व्यक्तित्व एक किन्तु कृतित्व अनेक के लिए श्री शर्मा जी आपको बहुत-बहुत बधाई तथा शुभकामना कि आप इसी प्रकार युगों-युगों तक बालसाहित्य की सेवा करते रहें।
 
-डॉ. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, निदेशक, जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय, लाडनूं

Friday, December 10, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -23

सरल और मासूम शिशु की भांति एक निश्छल आभा के धनी दीनदयाल शर्मा
साल का बच्चा। जी हां, बालसाहित्याकाश का एक ऐसा सूरज जिसे हम दीनदयाल जी शर्मा के नाम से जानते हैं। श्री दीनदयाल जी जैसे सुप्रबुद्ध तथा सशक्त व्यक्तित्व के बारे में कुछ भी कहना या लिखना मेरे लिए बड़ा ही चुनौती भरा कार्य रहा है। क्योंकि मेरे पास इतने शब्द ही नहीं है जिनके द्वारा मैं अपने मनोभावों को व्यक्त कर सकूं। इसके अलावा मन एक और उलझन में फंस गया कि सर्वप्रथम कौनसी बात लिखूं, चयन नहीं कर पा रही हूं। मन के जितने भी भाव हैं, उन्हें सर्वप्रथम ही लिखना चाहती हूं और ऐसा संभव है नहीं।
   
 सुपरिचित बाल साहित्यकार श्री दीनदयाल जी शर्मा का नाम किसी के लिए भी नया नहीं है। जिन विद्वान साहित्यकारों, कवियों, साहित्य/संस्कृति को अपने जीवन की साध माना है उनमें बाल साहित्यकार श्री दीनदयाल शर्मा का नाम सर्वप्रथम आता है। जसाना में जन्मे व पले-बढ़े श्री शर्मा जी आज उम्र में मेरे पापा के हमउम्र हैं। लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता क्योंकि जहां तक मैं जानती हूूं ये तो बच्चे हैं। क्योंकि ये हृदय से एकदम बच्चे की तरह सरल और निश्छल हैं। मैंने महसूस किया है कि उनमें आज भी एक बच्चे का दिल धड़कता है, और इसीलिए मैंने उन्हें बच्चा कहा है। हर वक्त इनके मुखमण्डल पर एक सरल और मासूम शिशु की भांति एक निश्छल आभा विराजमान रहती है जो किसी के भी मन को मोह लेने में सक्षम है। साथ ही एक खास बात और जो मेरे अंतस में गहरे तक उतरती है, ये बच्चों के साथ बच्चे और बड़ों के साथ बड़े हो जाते हैं। विषय हास परिहास का चल रहा हो तो आप दिल खोलकर हंसते-हंसाते हैं और यदि विषय गंभीर हो तो इनके चेहरे पर सागर सी गहराई झलकती है। साथ ही इनकी स्पष्टवादिता हरेक के मन में गहरे तक उतर जाती है।
    
सामान्य कद-काठी के साथ-साथ ये असाधारण व बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। अपनी अनुपम विचार शक्ति, प्रखर बुद्धि और ओजस्विता से सबको चकित कर देते हैं। इनकी हंसी अकृत्रिम है। इनके समक्ष बैठने के पश्चात परिचय का अभाव नहीं खलता। हर एक से मुक्त हृदय से मिलना-जुलना इनके स्वभाव में शामिल है। मालूम होता है कि श्री शर्मा जी किसी का भी दिल नहीं तोडऩा चाहते। इनका मुखर व्यक्तित्व हर अनजान को अपना बनाने का सामथ्र्य रखता है। आपके चेहरे पर दृढ़ निश्चयी होने के भावों के साथ ही संतोष के भाव झलकते हैं तथा पोशाक में सादगी है। इनके उठने बैठने, चलने-फिरने को देखकर पता चलता है कि जीवन में सादगी प्रिय है। कुछ और बातों पर है, जिनमें साहित्य पत्रकारिता, अध्यापन व बीसियों किस्म की अन्य सामाजिक जिम्मेदारियां शामिल हैं। जिस सभा में श्री दीनदयाल जी हों वहां उदासी एवं हताशा नहीं ठहरती। ऊर्जा का निरंतर प्रवाह इनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है। जो इनके सानिध्य में आने वालों को भी ऊर्जावान बना देता है। ये जहां भी होते हैं, अपने वात्सल्य से सभी को कायल करने से जान पड़ते हैं। आप हैं ही कुछ ऐसे की आपकी मधुर वाणी सुनने वालों के कानों में मधुरस घोलती सी जान पड़ती है।
    
श्री दीनदयाल जी का पारिवारिक वातावरण भी संस्कारित एवं आत्मीयतापूर्ण है। वहां जाकर कोई भी अपने अजनबीपन को बनाये नहीं रख सकता। अतिथि की वहां खैर नहीं है, क्योंकि इस परिवार के द्वारा निस्वार्थ भाव से की गई खातिरदारी अतिथि को एकदम फलक पर बैठा देती है। मुझे कई बार इस परिवार से मिलने का सौभाग्य मिला है। बनावट से कोसों दूर यह परिवार भारतीय संस्कृति का सजीव उदाहरण है। साहित्य मानव मन का ही भाव साम्राज्य होता है। जो बाहरी संसार हम देख रहे हैं उससे कहीं अधिक विस्तृत जगत हमारे मन में स्थित है। आवश्यकता होती है मन पर से अविचार का कोहरा छंटने की और श्री शर्मा जी से तो यह कोहरा कोसों दूर तक दिखाई ही नहीं देता। आज जब सब और अंग्रेजी भाषा और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है ऐसे समय में अपनी मातृभाषा में बाल मन को साहित्य के माध्यम से शिक्षित और संस्कारित करने का प्रयास श्री शर्मा जी कर रहे हैं वह अपने आप में अद्भुत है। शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि की रचना शब्द से हुई है। उसी शब्द ब्रह्मा की उपासना साहित्यकार अपनी-अपनी शैली में करते हैं। 

सरस्वती पुत्र अपनी लोकोत्तर प्रतिभा के द्वारा एक शब्द संसार की रचना करता है जो कि मानवीय समस्याओं को स्पष्ट रूप से उभारता है। नामरूपात्मकं विश्वं यदिदं दृश्यते द्विधा। तत्राघस्य कविर्वेधा, द्वितीयस्य चतुर्मुख:।।  अर्थात् नाम और रूपात्मकं जो दो प्रकार का यह संसार दीख प्रड़ता है, उसमें से आदि अर्थात् नामात्मक जगत का निर्माणकर्ता कवि है और रूपात्मक जगत का निर्माणकर्ता ब्रह्मा है। इसी प्रकार श्री दीनदयाल शर्मा शब्द संसार की रचना करके भावी पीढ़ी को संस्कारित करने में प्राणपण से लगे हैं। हिन्दी और राजस्थानी भाषा में आपका रचनाकर्म विविध खूबियों को संजोये हुए है। आपने अपने काव्य में बाल मनोविज्ञान को बहुत ही निकट से समझा है। बाल मन की जो समस्याएं सामान्य व्यक्ति को स्पष्ट नहीं हो पाती, वो आपके काव्य में मुखर हो उठती है। 

बाल साहित्य तीर्थ के महायात्री व शब्दयोगी श्री शर्मा जी ने आज बाल साहित्य को उस मुकाम पर पहुंचाया है जहां हम उनके बाल साहित्य पर गर्व कर सकते हैं। जीवन के अच्छे और बुरे दोनों रूपों का आपको गहरा अनुभव है और अहसास भी। आपके अनुभवों की कोई सीमा नहीं है। बाल जीवन से जुड़ी बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी चीज आपकी कलम का निशाना होती है और जहां तक मैं जानती हूं, ये सिर्फ लिखते नहीं, तन्मय होकर लिखते हैं, जीते हैं उसे। महसूस करते हैं, डूबते हैं उसमें। तभी तो सच्चा साहित्य मोती निकालकर लाये हैं हमारे सामने। वैसे भी मोती तो गोताखोर ही निकालते हैं भीगने से डरने वाले नहीं। यशस्वी बाल साहित्य पाठक को अपने नजदीक लाता है। बचपन के सामान्य अनुभव और अनुभूतियों से कैसे सार्थक और पठनीय साहित्य लिखा जा सकता है, इस तथ्य को श्री शर्मा जी के बाल साहित्य में स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। 

आपके साहित्य में बाल जीवन के व्यापक चित्र दिखाई देते हैं जो पाठक दृष्टि को चिन्तनशील बनाते हैं। आपके काव्य में हास्य के साथ-साथ व्यंग्य का चुटिलापन भी रहता है जो कि पाठक या श्रोता के हृदय को झकझोरता है। देश एवं समाज की दुर्दशा के बारे में सोचने को विवश करता है, आपके बहुत से व्यंग्य शिक्षक वर्ग की कमजोरियों और अकर्मण्यता को लेकर हैं जो सिद्ध करते हैं कि आप बालकों की शिक्षा को लेकर कितने गंभीर है। श्री दीनदयाल जी ग्रामीण और शहरी जीवन से गहरा सरोकार रखते हैं इसलिए आपके साहित्य में ग्रामीण और शहरी जीवन की सभी समस्याओं, विडम्बनाओं का प्रामाणिक लेखा-जोखा मिलता है। आपका बाल साहित्य ठोस यथार्थ के धरातल पर खड़ा हुआ दिखाई देता है। जिसमें कोरी काल्पनिक उड़ान की कोई गुंजाइश नहीं है। आप कवि हैं, लेखक हैं और साथ ही एक अध्यापक भी हैं लेकिन इन सबसे पहले आप एक जागरुक समाज सेवक हैं। 

आपका बाल साहित्य बच्चों और समाज के लिए मनमोहक उपहार है। बाल साहित्य सृजन आपकी तपस्या है, साधना है और इस साधना में आपका समर्पण भाव अभिनंदनीय है। इसी समर्पण भाव से आपने हिन्दी और राजस्थानी भाषा में बाल साहित्य को पूरी लगन और निष्ठा से प्रस्तुत किया है जिसमें जीवन के विभिन्न रंग अपनी सहजता और सरलता से प्रत्येक पाठक को लुभाने में सक्षम है। आपके बाल साहित्य में बाल मन की भावात्मक सुन्दरता के साथ-साथ कम शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यंजित हुई है।
    
बहुमुखी प्रतिभा के धनी और समाज सेवक श्री दीनदयाल जी ने पत्रकारिता के कार्य से भी समाज सेवा का बीड़ा उठाकर इस कार्य का सुन्दर ढंग से निर्वाह किया है। टाबर टोल़ी पाक्षिक तथा कानिया मानिया कुर्र त्रैमासिक जैसे पत्रों में आप दैनन्दिन समाचारों के साथ-साथ उत्कृष्ठ कविताओं, कहानियों व अन्य साहित्यिक प्रकाशन भी करते हें, जिससे नवोदित प्रतिभाओं को राजस्थानी, हिन्दी लेखन का भरपूर अवसर आप उपलब्ध करा रहे हैं। जो कि साहित्यिक उत्थान में एक सार्थक प्रयत्न है। मैंने साहित्य के प्रकाश पुंज श्री दीनदयाल जी के बारे में बहुत सुना, पढ़ा और जाना। परन्तु स्थिति एकदम वैसी ही है जैसी भूषण कवि के समक्ष आयी-
''साहू को सराहौ के सराहौ छत्रसाल को।'

मैं भी किसकी सराहना करूं? जहां इनका साहित्य भावों के भोलेपन से युक्त है वहीं इनके स्वभाव की दृढ़ता मेरे मन को गहराइयों तक स्पर्श करती है। श्री शर्मा जी सिर्फ लिखते नहीं, उसे जीते हैं। सिर्फ छूते नहीं महसूस करते हैं। सिर्फ देखते नहीं गौर करते हैं। सदा मुस्कुराना और सबको प्यार करना, गुणीजन का सम्मान पाना, बच्चों के दिल में रहना और सच्चे आलोचकों की स्वीकृति पाना, आदि बातें आपके स्वभाव में शामिल हैं। साथ ही आप खूबसूरती की सराहना करते हैं दूसरों में खूबियां तलाशते हैं और बिना किसी उम्मीद के दूसरों के लिए खुद को अर्पित कर देते हैं। आपके इन्हीं गुणों के बारे में सोचकर मेरा अन्र्तमन आलोकित हो उठता है। मां सरस्वती की कृपा आप पर हमेशा यूं ही बनी रहे तथा आप अपने अनुभव, चिन्तन आत्मीयता और समर्पण से बाल साहित्य जगत को अपनी लेखनी द्वारा समृद्ध करते रहें तथा आपका आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ बना रहे। इसी आशा और आपके सुदीर्घ स्वस्थ जीवन की मंगलकामनाओं के साथ। 

- कृष्णा जांगिड़ 'कीर्ति', जसाना
दिनांक :  5/03/2010

Wednesday, July 21, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -22

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी : 
दीनदयाल शर्मा

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचन्द या टालस्टाय के बारे में 'कुछ' लिखना बड़ा आसान लगता है। क्योंकि उनके द्वारा लिखे गए के अलावा उनके बारे में लिखा गया भी बहुत पढ़ा जा चुका है। पर किसी उस व्यक्ति के बारे में लिखा हुआ कम पढ़ा गया हो पर हो वह सुपरिचित। अब यह समझ में ही नहीं आ रहा कि श्री दीनदयाल शर्मा को क्या माना जाए?बाल साहित्यकार, साहित्यकार, कवि, हँसोड़, पत्रकार या फिर केवल मित्र। यह निर्णय कर पाना काफी कठिन है कि उनका कौनसा रूप उल्लेखनीय है या वे हरफनमौला हैं। कुछ भी हो, उन्हें यदि साहित्य का आमिर खान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हिन्दी फिल्म  जगत ज्यादातर अभिनेता कद में लम्बे हैं, पर कद में छोटा होने पर भी आमिर खान अभिनय में कइयों से ऊंचे हैं। इसी तरह सामान्य कद काठी के श्री दीनदयाल शर्मा भीड़ में चाहे छिप जाएं, पर साहित्य जगत में अपना कद काफी ऊंचा कर चुके हैं। यहां उन्हें छिपाना अब संभव नहीं है।

उनके परिचय का दायरा भी लम्बा-चौड़ा है। देश में कहीं भी जाएं, जहां दो-चार कवि, लेखक जुड़ेगे, इनके परिचित मिल ही जाएंगे। कुछ साल पहले उदयपुर में एक सज्जन मिले। परिचय हुआ। उन्हें बताया कि संगरिया हनुमानगढ़ जिले में हैं तो वे चहके-हनुमानगढ़ में तो एक वे हैं जो डुक मार कर हँसाते हैं...दीनदयाल जी..।

दुनियाभर में पहलवान दूसरे को रुलाने के लिए घंूसा मारते हैं। एक दीनदयाल शर्मा ही हैं, जो दूसरों को हँसाने के लिए घूंसे  या राजस्थानी 'डुक' मारते हैं। कहने का मतलब है कि मंच से जिसने भी इनकी राजस्थानी कविताएं सुन ली हैं, वह इन्हें भूल नहीं सकते। अभी कुछ दिन पहले अलवर के श्री सुमतिकुमार जैन से बात हुई तो बोले आपके हनुमानगढ़ में तो हमारे परिचित हैं...। वे आगे कुछ बोले, इससे पहले ही मेरे मुँह से निकल गया-दीनदयाल शर्मा...। 

हां, बिल्कुल यही....।

जो वे बताने जा रहे थे। कभी-कभी लगता है हनुमानगढ़ को प्रसिद्धि भटनेर या घग्घर से नहीं बल्कि श्री दीनदयाल शर्मा से ज्यादा मिली है। अनजान व्यक्तियों से भी उन्हें सहजता से बात करते, उनसे घुलते-मिलते देखा गया है। गाड़ी में, बस में...खाली रस्मी परिचय नहीं, रचनात्मक। एक बार गाड़ी में उनके साथ स$फर करते हुए देखा कि अपरिचित से परिचित होते ही उन्होंने उसके हाथ में अपनी कोई किताब या टाबर टोल़ी का नया अंक थमा दिया। इस हिदायत के साथ कि खुद भी पढऩा और बच्चों को भी पढ़ाना। यदि दीनदयाल के बस्ते में दो किताब है तो समझिए, किताबें कैद में नहीं रहेंगी। उन्हें पाठक मिलेंगे। मेरे जैसे व्यक्ति के साथ श्री दीनदयाल बैठते हैं तो कितना अजीब लगता होगा। क्योंकि मैं किताबें बांटने में जितना कंजूस हूँ , वे उतने ही उदार।

जब भी किसी लेखक के बारे में अखबार में कोई सुसमाचार छपे और सुबह-सुबह ही लेखक, को 'मैसेज' का संकेत मिले तो सब समझ जाते हैं कि श्री दीनदयाल का बधाई संदेश है। इसलिए मजाक में यही कहा जाता है कि श्री दीनदयाल शर्मा रात में सोने से पहले 'अगले दिन' का दैनिक पढ़ लेते हैं और जागते ही मुँह धोने से पहले बधाई का एस.एम.एस. भेज देते हैं। इनकी यह सजगता और तत्परता लेखक और अ$खबार दोनों को निहाल कर देती है।

श्री दीनदयाल शर्मा को अभी तक टीवी के लाफ्टर शो में जाने का अवसर नहीं मिला है। इसलिए वे हमें और आपको हँसा कर अपनी इस कला का प्रदर्शन करते रहते हैं। अखबार में वर्गीकृत विज्ञापन की तरह वर्गीकृत लतीफों का भी उनके पास भंडार है। जैसे आप हैं, वैसा ही लतीफाबाण आपकी ओर आता दिखाई देगा। आपको नाक-भौं सिकोडऩे का मौका नहीं देंगे कि आप कहें-यह क्या सुना दिया। मर्यादा ही भंग कर दी। यही कारण है कि लड़कियों के कॉलेज में भी कन्याओं का मनोरंजन करने बुला लिए जाते हैं। स्टाफ निश्चित रहता है कि सीमारेखा का उल्लंघन नहीं होगा। आजकल तो पता नहीं, पहले तो $खुद दीनदयाल ही इसकी व्यवस्था करते थे। जब लड़कियों, महिलाओं की सभा में हास्य बिखेरने जाते थे, तब अद्र्धांगिनी श्रीमती कमलेश शर्मा को साथ ले जाते ताकि नियंत्रित रहें। ऐसा बताकर वे सरलता से स्वीकार करते रहे हैं कि उन पर बीवी का कंट्रोल है।

खैर, यह तो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की बात है। यदि उनके कृतित्व पर दृष्टिपात करें तो वह भी कम नहीं है। उनकी 'मैं उल्लू हूँ ' यह उनकी स्वीकारोक्ति नहीं, उनके व्यंग्य संग्रह का शीर्षक है। उनके व्यंग्य लेखन का पुख्ता प्रमाण है। बाल साहित्य में उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके कई बाल कथा संग्रह तो तभी छप गए थे जब आज के कई साहित्यकार शैशवास्था में थे। कवि के रूप में तो यही कहा जाएगा कि आज तक किसी मंच पर असफल नहीं हुए हैं। उनके लिए आमतौर पर 'एक और'... 'एक और'.... सुनाई देता है। क्षेत्र के कई साहित्यकारों को 'प्रकाशित' होने में उन्होंने संपादन-प्रकाशन मार्ग निर्देशन के क्षेत्र में अभूतपूर्व सहयोग दिया है। इनकी वजह से कइयों के हाथ में उनकी प्रकाशित कृतियां हैं। पर पत्रकारिता के क्षेत्र में टाबर टोल़ी उनका अभिनव प्रयोग है। 

राजस्थान से बाहर हिन्दी क्षेत्रों में उनके पाक्षिक का नाम कइयों को भ्रमित कर देता है, पर मैटर उन्हें हर्षित करता है। साहित्य और बाल साहित्य से जुड़े इस पाक्षिक को उनके धैर्य का प्रतीक कहा सकता है। गत सात वर्षों से निरंतर नियमित प्रकाशन, संपादन... वह भी साधन विहीनता की स्थिति में आश्चर्यचकित तो करता ही है। इसी उत्साह ने उन्हें एक बार कानिया मानिया कुर्र..नाम से राजस्थानी बाल अख़बार प्रकाशित करने की प्रेरणा हुई। पर तीनेक साल से आगे यह गाड़ी नहीं चली। काश...राजस्थानी अभियान के नेता आगे आते और एक नये नवेले राजस्थानी बाल अखबार को मरने न देते। खैर, कुछ भी हो, जीवन में अक्सर झंझावतों का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए, उनकी यह जिजीविषा बनी रहे, यही कामना है।                        

गोविंद शर्मा,  ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राजस्थान
1-15 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार "टाबर टोळी " से साभार

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -21


बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर : 
श्री दीनदयाल शर्मा

कभी-कभी मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि हमारे बीच के ही कुछ साहित्यकार इस बात से चिंतित दिखाई देते हैं कि बच्चों के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध लेखक प्राय: नहीं लिख रहे हैं, यह बात बाल साहित्य के लिए अच्छी नहीं है। या फिर बड़ों के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते, इस कारण बाल साहित्य में स्तरीय रचनाओं का अभाव हो गया है। 

मुझे लगता है ऐसा है नहीं। यह बहुत सीमित सोच की उपज लगती है। अमुक लेखक बड़े हैं, बड़ा नाम है लेकिन बच्चों के लिए नहीं लिखते। ऐसे तथ्य ही बाल-साहित्य को हतोत्साहित करने को काफी हैं। 

एक कारण और मेरी समझ से यह भी है कि बाल साहित्य पर गंभीर रूप से, संजीदगी के साथ समीक्षात्मक कार्य न हो पाने के कारण बाल साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएं साहित्य-प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय नहीं बन पाती हैं। शायद इसीलिए हमारे कुछ बौद्धिक साहित्यिक मित्रों, लोगों को लगता है कि देश में बाल-साहित्य सर्जकों की कमी है, या फिर श्रेष्ठ बाल साहित्य अब नहीं रचा जा रहा। यह तो निराशावादी दृष्टि है। 

साथ ही मेरा यह भी मानना  है कि हर लेखक बाल-साहित्य लिख ही नहीं सकता। बच्चों के लिए लिखने में बच्चों जैसा मन प्राप्त करना पहली शर्त है। 

आप बड़ों के मन को भले ही टटोल लेंगे कि भीतर क्या चल रहा है? लेकिन बच्चों के मन की थाह पा लेना आसान नहीं। उनका कल्पना संसार बड़ा अद्भुत है। मौलिक भी है। बच्चों के मन को बांचने, फिर उसे बांध लेने का कौशल प्रदर्शित करना सिद्धहस्त साहित्यकार के लिए ही सम्भव है। ऐसा साहित्यकार ही समय की नब्ज़ को पहचानने और उसी अनुरूप अपनी लेखनी में भी बदलाव कर लेता है। पुराने और नए के बीच सामंजस्य भी बना लेता है। यह प्रसन्नता की ही बात है कि जिन बाल साहित्यकारों ने इस बदलाव को समझ लिया है, उनमें देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार दीनदयाल शर्मा भी शामिल है। श्री शर्मा ने हिन्दी साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं में लेखन किया है। अनेक पुस्तकों का संपादन भी इन्होंने किया है। चूंकि स्वयं मन से सरल, सरस, खुश मिज़ाज व्यक्ति हैं इसलिए बाल-साहित्य भी रचते रहे हैं। अपनी रचनाओं में हास्य के रंग भी बिखेरते रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इनका लेखन नियमित रहता है। बाल साहित्य संबंधी गोष्ठियों में भी इनकी जीवंत उपस्थिति दूर-दूर तक रहती है। जैसा सीधा-सादा व्यक्ति है वैसा ही सीधा-सादा व्यक्तित्व। इनकी रचनाओं में नाना प्रकार के भाव एवं आस्वाद सहज रूप से देखने को मिलता है। कोई बौद्धिक लठैतपना नहीं, कोई पांडित्य भी नहीं। सहज, मन का स्पर्श करती हुई लेखनी। 

श्री दीनदयाल शर्मा बाल साहित्य को हर तरह से प्रासंगिक बनाने के अपने संकल्प में हर तरह से समर्पित दिखाई देने वाले साहित्यकार हैं। वे देश के एक महत्वपूर्ण बाल साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान तेज़ी से बनाते जा रहे हैं तो मेरे ख्याल से इसके पीछे है- इनकी तर्क दृष्टि। इन्होंने यह अच्छी तरह से समझ लिया है कि अब सन् साठ के बच्चों के लिए नहीं, बल्कि आज के उन बच्चों के लिए लिखना है जो वर्तमान के हमारे जीवन, समाज, संस्कृति, राजनीति, अपराध आदि से अनभिज्ञ नहीं हैं। वे कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले बच्चे हैं। इनके अपने सपने हैं, अपनी अभिलाषाएं हैं, अपनी समस्याएं हैं और जो उनके पालनहारों से काफी भिन्न है। 

इसलिए वर्तमान की कटु सच्चाइयों के समाधान बताने वाली, जीवन में उत्साह, सकारात्मक सोच देने वाली रचनाएं लेकर ही बाल पाठकों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए बच्चों को स्वस्थ दिशा-निर्देश देना होगा-उपदेश से नहीं, उनके अपने जीवन और आस-पास के घटते घटनाचक्र के माध्यम से। 

मुझे सदैव इस बात की भी प्रसन्नता रही है कि श्री दीनदयाल शर्मा ने अपने बाल-साहित्य में मनोरंजन और विज्ञान के साथ-साथ सीख और परंपरा को नकारा नहीं है, बल्कि इन सबका सम्मान, स्वीकारोक्ति भाव से, समुचित व परस्पर सामंजस्य बनाए हुए वे बाल साहित्य की रचना कर रहे हैं। मेरी दृष्टि में यह एक बहुत बड़ी बात है। इसलिए भी कि जब महानगर की सीमेंट-कंक्रीट वाली संस्कृति से जुड़े बाल-साहित्यकार के लेखन में से वे विषय तेज़ी से आगे बढऩे के चक्कर में पीछे छूटते जा रहे हैं, जिनमें शामिल है हमारे खेत-खलिहान, गांव, कस्बे, छोटे शहर, समाज, घर-परिवार। दीनदयाल शर्मा अपनी रचनाओं में इन्हें भी साथ लेकर चलते हैं। 

हनुमानगढ़ निवासी कलम का यह सिपाही आज देश में बाल साहित्य का सशक्त हस्ताक्षर है। इस प्यारे इन्सान, संजीदा और बच्चों-बड़ों में समान लोकप्रिय साहित्यकार की लेखनी से उपजी रचनाएं इसी प्रकार हमें मिलती रहेंगी, ऐसी आशा है। हिंदी व राजस्थानी में समानांतर लेखन वाले, अनेक पुस्तकों के रचयिता दीनदयाल शर्मा की कलम को मेरा भी सलाम पहुंचे। हार्दिक शुभकामनाएं। 

-सुधीर सक्सेना 'सुधि'
75/44, शिप्रा पथ, 
मानसरोवर, जयपुर



1-15 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार "टाबर टोळी " से साभार




Saturday, July 17, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -20


बाल साहित्य के क्षेत्र में 
विशिष्ट स्थान रखते हैं दीनदयाल शर्मा

हिन्दी एवं राजस्थानी बाल साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं श्री दीनदयाल शर्मा। हिन्दी राजस्थानी भाषा में आपकी अनेक कृतियां प्रकाशित हैं। कुछ रचनाओं का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। 

बाल साहित्य के अलावा  कविता, नाटक, कथा, हास्य व्यंग्य आदि अनेक विधाओं पर आपने कलम चलाई है। आपके लिखे कई नाटक विभिन्न शहरों-गांवों में मंचित हुए हैं, वहीं आकाशवाणी से राज्य स्तर पर समय-समय पर प्रसारित हुए हैं। पगली, मुझे माफ कर दो, उसकी सजा आदि नाटक सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष करते हैं। साथ ही समाज को एक संदेश भी देते हैं। 

हास्य रचनाओं में आपके 'सेन्स ऑफ ह्यूमर' का पता चलता है। दैनंदिन बातों मं से हास्य निकालने में आपको महारत हासिल है। आपकी हास्य रचनाओं को पढ़कर या सुनकर कोई बिना हंसे या मुस्कुराए रह ही नहीं सकता। आपके व्यंग्य इतने तीखे एवं सटीक होते हैं कि व्यक्ति सोचने पर मजबूर हो जाता है। कोई भी घटना जिस पर व्यंग्य किया जा सकता है, आपकी नज़र से बच नहीं पाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, प्रशासन, व्यापार जहां भी आपको अनुचित कार्य होता दिखाई देता है, आपकी कलम उस पर तुरंत कटाक्ष करती है। 

लेकिन बाल साहित्य में आपकी विशेष रूचि है। आपने बाल साहित्य में संपूर्ण भारत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में पहला पाक्षिक अ$खबार 'टाबर टोल़ी' को आरंभ करवाने का श्रेय भी आपको ही हासिल है। आप इस बाल पत्र के मानद संपादक हैं। इस पाक्षिक बाल अखबार में आप बहुत ही ज्ञानोपयोगी जानकारी उपलब्ध करवाकर बच्चों में अच्छे संस्कार डालने एवं साहित्य के प्रति रूचि बढ़ाने का अति महत्त्वपूर्ण कार्य करने में लगे हुए हैं। जिसकी जितनी सराहना की जाए, कम है। आपने 'टाबर टोल़ी' को झोंपड़ी से लेकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाया है। दो- दो राष्ट्रपतियों से मुलाकात करना और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम द्वारा 2005 में आपकी किताब 'द ड्रीम्स' का लोकार्पण करना .....यह सौभाग्य किसी विरले लेखक को ही मिलता है। 

साहित्य सृजन के साथ-साथ पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियां भी आप बखूबी निभा रहे हैं। आपके भीतर बैठा कलाकार सिर्फ विद्यालय तक ही कैसे सीमित रह सकता है। आप अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं में पदाधिकारी हैं। साथ ही आप नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए नियमित रूप से संगोष्ठियां, पुस्तक चर्चा व कविता पाठ जैसे  आयोजन भी समय-समय पर करते हुए साहित्य सेवा में रत हैं। आप आकाशवाणी  व दूरदर्शन पर अपनी रचनाओं को पेश कर श्रोता/दर्शकों को लाभान्वित करते रहते हैं। 

बाल  साहित्य में आपकी रूचि एवं इस क्षेत्र में आपके कार्यों के कारण आप भारत के बाल साहित्यकारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। आपको विभिन्न संस्थाओं एवं अकादमियों द्वारा समय-समय पर सम्मानित एवं पुरस्कृत किया है। जो आपकी साहित्यिक सेवा का ही फल है। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

अर्जुनदान चारण, 
सहायक वन संरक्षक,
फलौदी, जिला: जोधपुर, राज.
मोबाइल : 09414482882

16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार टाबर टोळी से साभार

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -19

दीनदयाल शर्मा : एक कर्मठ बाल साहित्यकार

प्रिय अनुज दीनदयाल शर्मा को मैं पिछले दो दशकों से जानता हंू। मैंने सदैव इन्हें एक उत्साही बाल साहित्यकार के रूप में देखा है और ये आज भी उसी उत्साह, उमंग और निश्छलता के सम्य बाल सहित्य की सच्ची सेवा करने में जुटे हैं। निरंतर लेखन और प्रकाशन में लीन हैं। मैं उनकी लगन की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता हंू। ये बच्चों के उत्थान में दैनंदिन लगे रहते हैं। आलस्य और सुस्ती का कहीं कोई नाम निशान नहीं।

बच्चों के लिए भरपूर साहित्य सृजन करने वाले प्रिय भाई दीनदयाल राजस्थान के बाल साहित्यकारों में अपना नाम स्थापित कर चुके हैँ और उत्तरी भारत में बाल साहित्य का दीपक प्रज्ज्वलित करने वाले अग्रणी बाल साहित्यकार हैं। टाबर टोल़ी पाक्षिक अब एक जाना-माना पत्र बन चुका है और इसका श्रीगणेश भाई दीनदयाल जी के निर्देशन में हुआ। टाबर टोल़ी अपने ढंग का एक अनूठा पत्र है। इसके नाम से स्पष्ट हो जाता है कि यह शुद्ध रूप से बच्चों का, बच्चों के लिए और अभिभावकों के लिए हैं। स्वयं बच्चे इस पत्र में छपते रहे हैं।

एक अच्छा बाल साहित्कार होने के लिए सर्वप्रथम एक अच्छा व्यक्ति होना अनिवार्य है। भाई दीनदयाल जी शुद्ध  आचरण वाले तथा सरल व्यक्ति हैं और इन्हीं गुणों के कारण वे उत्कृष्ट साहित्य रचने में सफल हुए हैं और भविष्य में मील के कई पत्थर स्थापित करेंगे। 

मैं भाई दीनदयाल जी के इस विचार से सहमत हंू कि आज हर कोई बाल साहित्यकार बनने में जुटा है या यों कहें कि बाल साहित्य में घुसपैठ हो रही है। मैं ऐसे कई तथाकथित बाल साहित्यकारों को जानता हंू जो प्रौढ़ों के लिए लिखने का प्रयास किया करते थे। वहां असफल होने पर बाल साहित्य में आकर घुस गए। जबकि बच्चों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है।

जब आप बच्चों के क्रियाकलापों को नियमित नहीं देखेंगे तथा उनके संपर्क में नहीं रहेंगे तो आप बाल साहित्यकार बन ही नहीं सकते। अत: बच्चों का साहचर्य, बच्चों के स्नेह और प्यार को प्राप्त करना अत्यावश्यक है।

इस संक्षिप्त लेख के अंत में भाई दीनदयाल जी के स्वस्थ, दीर्घ और उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता हंू। बाल गोपाल मण्डली, जो टाबर टोल़ी से जुड़ी हुई है, को ढेर सारी शुभकामनाएं अर्पित करता हंू। बाल देवो भव:।

रामनिरंजन शर्मा 'ठिमाऊ',
पिलानी, जिला: झुंझुनूं, राज.
मोबाइल : 9413484840

16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार टाबर टोळी से साभार

Friday, July 16, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -18

सीधे-सरल और हंसोड़ प्रवृत्ति के 
इन्सान हैं दीनदयाल शर्मा

लेखन यात्रा के शुरुआती कदम थे। बाल कहानियां लिखता था। कदम डगमगाते, संतुलन बिगड़ता तो भाई राकेश शरमा (अब दिवंगत) और मासूम गंगानगरी अंगुली थाम कर गिरने से बचाते। राज्य व राष्ट्रीय स्तर की कुछ पत्र-पत्रिकाओं में बाल कहानियां छपी तो मित्रों ने राय दी कि बाल कथा संग्रह छपवाया जाए। अनुभव था नहीं, किसी ने बताया कि हनुमानगढ़ में दीनदयाल शर्मा हैं, वे प्रकाशन में मार्गदर्शन कर देंगे और पुस्तक छपवा भी देंगे। 

संयोग से अगले दिन राजस्थान पत्रिका में दीनदयाल शर्मा की कविताएं छपीं। नीचे पता भी छपा था। मैंने एक पोस्टकार्ड डाल कर एक पुस्तक छपवाने की इच्छा जताई। चार दिन बाद ही जवाब मिला, इस उलाहने के साथ कि आपने मेरा पता राजस्थान पत्रिका से लिया लेकिन कविताओं का जि़क्र ही नहीं किया। मैं अनाड़ी आदमी, उस समय न तो कविता पर टिप्पणी करनी आती थी और न ही इतनी समझ थी कि कविताओं से बात शुरू कर पुस्तक तक आना चाहिए। 

खैर! दीनदयाल जी ने हनुमानगढ़ आकर मिलने का न्यौता दिया तो एक रविवार को बाल कथाओं की पांडुलिपि लेकर पहुंच गया उनके घर। दीनदयाल शर्मा व भाभीजी ने पूरी आवभगत की। तीन घण्टे की बैठक में दीनदयाल जी ने मुझे स्पष्ट राय दी कि मैं नया हंू। मुझे किताब छपवाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए। फिर भी मेरा दिल रखने के लिए उन्होंने पांडुलिपि रख ली। 

बाद में उनमें से मेरी एक बाल कहानी उन्होंने अपने संपादन में निकले कुछ बाल कथाकारों के संकलन में भी शामिल की। इस बीच मेरा भी विचार बना कि मैं पुस्तक छपवाने की जल्दी न करूं। मैंने दीनदयाल जी को पत्र लिखकर पांडुलिपि मांगी। उन्होंने बताया कि बाल कथा संग्रह संपादन के दौरान वह पांडुलिपि दिल्ली ले गए थे और वह पांडुलिपि अब भी दिल्ली में एक प्रेस पर पड़ी है। 

पांडुलिपि मांगने का यह सिलसिला साल भर तक चला और एक दिन दीनदयाल जी ने बताया कि जमुना में बाढ़ आने से वह पांडुलिपि व प्रेस की बहुत सारी सामग्री बह गई है। अब वह नहीं मिल सकती। यह बात 1987-88 की है। दो दशक से भी ऊपर समय बीत जाने के बाद मुझे लगता है कि जमुना की बाढ़ में बही मेरी बाल कथाओं की पांडुलिपि ने दीनदयाल शर्मा से मेरी मित्रता और भी गहरा कर दिया है।

इलाहाबाद में जब मुझे मीरा स्मृति सम्मान मिला तो अपनी 85 वर्षीया माताश्री के साथ दीनदयाल जी व भाभीजी श्रीमती कमलेश शर्मा के सान्निध्य में तीन-चार दिन प्रयाग धाम में रहने का अवसर मिला।  उन दिनों को मेरी मां आज भी याद करती है। मेरी मां का जितना ख्याल दीनदयाल जी व भाभीजी ने रखा, उतना मैं स्वयं भी नहीं रख पाया। उन दिनों की स्मृति ही हमारी पूंजी है।

दीनदयाल शर्मा सीधे-सरल और हंसोड़ प्रवृत्ति के इन्सान हैं। हर बात पर चुटकला उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है, मुझे लगता है कि जिस स्कूल में वे कार्यरत हैं, वहां के बच्चे कितना कुछ सीखते होंगे इस सरल हृदयी इन्सान से। आमीन।

कृष्णकुमार 'आशु', पत्रकार व साहित्यकार
128, मुन्शी प्रेमचन्द कॉलोनी, 
माइक्रोवेव टावर के पास, 
पुरानी आबादी, श्रीगंगानगर
मो. 9414658290
9772608000

16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार टाबर टोळी से साभार

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -17

बहुमुखी प्रतिभा के धनी : दीनदयाल शर्मा

'टाबर टोल़ी' का अंक जब-जब पढऩे का सौभाग्य मिला......मैं श्री दीनदयाल शर्मा द्वारा लिखित रचना या कॉलम ढंूढ़ता रहा। आओ सीखें : शुद्ध लेखन हो या समीक्षा, लेख हो या कविता, हिन्दी में हो या राजस्थानी में....वे प्रभावी लिखते हैं और पाठक पर छाप छोडऩे वाला लेखन करते हैं। बच्चों के लिए तो वे निरन्तर लिखते रहे हैं और सम्मानित-पुरस्कृत होते रहे हैं। यह एक गौरवपूर्ण बात हैं वे इस तन्मयता से सृजनरत हैं और साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे हैं।

'टाबर टोल़ी' के माध्यम से नया कीर्तिमान रचा है। अपनी संपादकीय सूझबूझ से उन्होंने अनेकानेक लेखकों-कवियों को जोड़ा है और विपुल साहित्य प्रस्तुत किया है। एक बाल-पत्र को नियमितता देकर राज्य में बाल साहित्य के रचनाकारों को मंच प्रदान किया है।

इतनी-इतनी उपलब्धियों के बाद भी वे विनम्र हैं, समर्पित हैं एवं आदर्श हैं। बाल साहित्य में उनका नाम सम्मान के साथ जुड़ा है। देशभर में अपनी पहचान बनाने वाले श्री दीनदयाल शर्मा उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ रहे हैं। पर, अकेले नहीं, कई रचनाधर्मी मित्रों को साथ लेकर।

एक तथ्य जो मैंने महसूस किया वे जोड़ तोड़ से ऊपर हैं। कोई भी रचनाकार हो, उसे उचित सम्मान देते हैं चाहे परिचित हो या न हो। खेमेबाजी से दूर रह कर ही वे इतना कुछ श्रेष्ठ कर पाये हैं। उनकी पुस्तकों पर मेरे अन्य मित्रों ने विस्तार से चर्चा की है। वे नि:संदेह प्रशंसा के योग्य हैं। अनेक शुभकामनाएं ऐसे रचनाकार के लिए।

-डॉ.विनोद सोमानी 'हंस',
42/43, जीवन विहार कॉलोनी, 
आना सागर सरक्यूलर रोड, 
अजमेर-305004, राज.
दूरभाष : 0145-2627479

16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार 'टाबर टोल़ी' से साभार