Friday, December 10, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -23

सरल और मासूम शिशु की भांति एक निश्छल आभा के धनी दीनदयाल शर्मा
साल का बच्चा। जी हां, बालसाहित्याकाश का एक ऐसा सूरज जिसे हम दीनदयाल जी शर्मा के नाम से जानते हैं। श्री दीनदयाल जी जैसे सुप्रबुद्ध तथा सशक्त व्यक्तित्व के बारे में कुछ भी कहना या लिखना मेरे लिए बड़ा ही चुनौती भरा कार्य रहा है। क्योंकि मेरे पास इतने शब्द ही नहीं है जिनके द्वारा मैं अपने मनोभावों को व्यक्त कर सकूं। इसके अलावा मन एक और उलझन में फंस गया कि सर्वप्रथम कौनसी बात लिखूं, चयन नहीं कर पा रही हूं। मन के जितने भी भाव हैं, उन्हें सर्वप्रथम ही लिखना चाहती हूं और ऐसा संभव है नहीं।
   
 सुपरिचित बाल साहित्यकार श्री दीनदयाल जी शर्मा का नाम किसी के लिए भी नया नहीं है। जिन विद्वान साहित्यकारों, कवियों, साहित्य/संस्कृति को अपने जीवन की साध माना है उनमें बाल साहित्यकार श्री दीनदयाल शर्मा का नाम सर्वप्रथम आता है। जसाना में जन्मे व पले-बढ़े श्री शर्मा जी आज उम्र में मेरे पापा के हमउम्र हैं। लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता क्योंकि जहां तक मैं जानती हूूं ये तो बच्चे हैं। क्योंकि ये हृदय से एकदम बच्चे की तरह सरल और निश्छल हैं। मैंने महसूस किया है कि उनमें आज भी एक बच्चे का दिल धड़कता है, और इसीलिए मैंने उन्हें बच्चा कहा है। हर वक्त इनके मुखमण्डल पर एक सरल और मासूम शिशु की भांति एक निश्छल आभा विराजमान रहती है जो किसी के भी मन को मोह लेने में सक्षम है। साथ ही एक खास बात और जो मेरे अंतस में गहरे तक उतरती है, ये बच्चों के साथ बच्चे और बड़ों के साथ बड़े हो जाते हैं। विषय हास परिहास का चल रहा हो तो आप दिल खोलकर हंसते-हंसाते हैं और यदि विषय गंभीर हो तो इनके चेहरे पर सागर सी गहराई झलकती है। साथ ही इनकी स्पष्टवादिता हरेक के मन में गहरे तक उतर जाती है।
    
सामान्य कद-काठी के साथ-साथ ये असाधारण व बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। अपनी अनुपम विचार शक्ति, प्रखर बुद्धि और ओजस्विता से सबको चकित कर देते हैं। इनकी हंसी अकृत्रिम है। इनके समक्ष बैठने के पश्चात परिचय का अभाव नहीं खलता। हर एक से मुक्त हृदय से मिलना-जुलना इनके स्वभाव में शामिल है। मालूम होता है कि श्री शर्मा जी किसी का भी दिल नहीं तोडऩा चाहते। इनका मुखर व्यक्तित्व हर अनजान को अपना बनाने का सामथ्र्य रखता है। आपके चेहरे पर दृढ़ निश्चयी होने के भावों के साथ ही संतोष के भाव झलकते हैं तथा पोशाक में सादगी है। इनके उठने बैठने, चलने-फिरने को देखकर पता चलता है कि जीवन में सादगी प्रिय है। कुछ और बातों पर है, जिनमें साहित्य पत्रकारिता, अध्यापन व बीसियों किस्म की अन्य सामाजिक जिम्मेदारियां शामिल हैं। जिस सभा में श्री दीनदयाल जी हों वहां उदासी एवं हताशा नहीं ठहरती। ऊर्जा का निरंतर प्रवाह इनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है। जो इनके सानिध्य में आने वालों को भी ऊर्जावान बना देता है। ये जहां भी होते हैं, अपने वात्सल्य से सभी को कायल करने से जान पड़ते हैं। आप हैं ही कुछ ऐसे की आपकी मधुर वाणी सुनने वालों के कानों में मधुरस घोलती सी जान पड़ती है।
    
श्री दीनदयाल जी का पारिवारिक वातावरण भी संस्कारित एवं आत्मीयतापूर्ण है। वहां जाकर कोई भी अपने अजनबीपन को बनाये नहीं रख सकता। अतिथि की वहां खैर नहीं है, क्योंकि इस परिवार के द्वारा निस्वार्थ भाव से की गई खातिरदारी अतिथि को एकदम फलक पर बैठा देती है। मुझे कई बार इस परिवार से मिलने का सौभाग्य मिला है। बनावट से कोसों दूर यह परिवार भारतीय संस्कृति का सजीव उदाहरण है। साहित्य मानव मन का ही भाव साम्राज्य होता है। जो बाहरी संसार हम देख रहे हैं उससे कहीं अधिक विस्तृत जगत हमारे मन में स्थित है। आवश्यकता होती है मन पर से अविचार का कोहरा छंटने की और श्री शर्मा जी से तो यह कोहरा कोसों दूर तक दिखाई ही नहीं देता। आज जब सब और अंग्रेजी भाषा और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है ऐसे समय में अपनी मातृभाषा में बाल मन को साहित्य के माध्यम से शिक्षित और संस्कारित करने का प्रयास श्री शर्मा जी कर रहे हैं वह अपने आप में अद्भुत है। शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि की रचना शब्द से हुई है। उसी शब्द ब्रह्मा की उपासना साहित्यकार अपनी-अपनी शैली में करते हैं। 

सरस्वती पुत्र अपनी लोकोत्तर प्रतिभा के द्वारा एक शब्द संसार की रचना करता है जो कि मानवीय समस्याओं को स्पष्ट रूप से उभारता है। नामरूपात्मकं विश्वं यदिदं दृश्यते द्विधा। तत्राघस्य कविर्वेधा, द्वितीयस्य चतुर्मुख:।।  अर्थात् नाम और रूपात्मकं जो दो प्रकार का यह संसार दीख प्रड़ता है, उसमें से आदि अर्थात् नामात्मक जगत का निर्माणकर्ता कवि है और रूपात्मक जगत का निर्माणकर्ता ब्रह्मा है। इसी प्रकार श्री दीनदयाल शर्मा शब्द संसार की रचना करके भावी पीढ़ी को संस्कारित करने में प्राणपण से लगे हैं। हिन्दी और राजस्थानी भाषा में आपका रचनाकर्म विविध खूबियों को संजोये हुए है। आपने अपने काव्य में बाल मनोविज्ञान को बहुत ही निकट से समझा है। बाल मन की जो समस्याएं सामान्य व्यक्ति को स्पष्ट नहीं हो पाती, वो आपके काव्य में मुखर हो उठती है। 

बाल साहित्य तीर्थ के महायात्री व शब्दयोगी श्री शर्मा जी ने आज बाल साहित्य को उस मुकाम पर पहुंचाया है जहां हम उनके बाल साहित्य पर गर्व कर सकते हैं। जीवन के अच्छे और बुरे दोनों रूपों का आपको गहरा अनुभव है और अहसास भी। आपके अनुभवों की कोई सीमा नहीं है। बाल जीवन से जुड़ी बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी चीज आपकी कलम का निशाना होती है और जहां तक मैं जानती हूं, ये सिर्फ लिखते नहीं, तन्मय होकर लिखते हैं, जीते हैं उसे। महसूस करते हैं, डूबते हैं उसमें। तभी तो सच्चा साहित्य मोती निकालकर लाये हैं हमारे सामने। वैसे भी मोती तो गोताखोर ही निकालते हैं भीगने से डरने वाले नहीं। यशस्वी बाल साहित्य पाठक को अपने नजदीक लाता है। बचपन के सामान्य अनुभव और अनुभूतियों से कैसे सार्थक और पठनीय साहित्य लिखा जा सकता है, इस तथ्य को श्री शर्मा जी के बाल साहित्य में स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। 

आपके साहित्य में बाल जीवन के व्यापक चित्र दिखाई देते हैं जो पाठक दृष्टि को चिन्तनशील बनाते हैं। आपके काव्य में हास्य के साथ-साथ व्यंग्य का चुटिलापन भी रहता है जो कि पाठक या श्रोता के हृदय को झकझोरता है। देश एवं समाज की दुर्दशा के बारे में सोचने को विवश करता है, आपके बहुत से व्यंग्य शिक्षक वर्ग की कमजोरियों और अकर्मण्यता को लेकर हैं जो सिद्ध करते हैं कि आप बालकों की शिक्षा को लेकर कितने गंभीर है। श्री दीनदयाल जी ग्रामीण और शहरी जीवन से गहरा सरोकार रखते हैं इसलिए आपके साहित्य में ग्रामीण और शहरी जीवन की सभी समस्याओं, विडम्बनाओं का प्रामाणिक लेखा-जोखा मिलता है। आपका बाल साहित्य ठोस यथार्थ के धरातल पर खड़ा हुआ दिखाई देता है। जिसमें कोरी काल्पनिक उड़ान की कोई गुंजाइश नहीं है। आप कवि हैं, लेखक हैं और साथ ही एक अध्यापक भी हैं लेकिन इन सबसे पहले आप एक जागरुक समाज सेवक हैं। 

आपका बाल साहित्य बच्चों और समाज के लिए मनमोहक उपहार है। बाल साहित्य सृजन आपकी तपस्या है, साधना है और इस साधना में आपका समर्पण भाव अभिनंदनीय है। इसी समर्पण भाव से आपने हिन्दी और राजस्थानी भाषा में बाल साहित्य को पूरी लगन और निष्ठा से प्रस्तुत किया है जिसमें जीवन के विभिन्न रंग अपनी सहजता और सरलता से प्रत्येक पाठक को लुभाने में सक्षम है। आपके बाल साहित्य में बाल मन की भावात्मक सुन्दरता के साथ-साथ कम शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यंजित हुई है।
    
बहुमुखी प्रतिभा के धनी और समाज सेवक श्री दीनदयाल जी ने पत्रकारिता के कार्य से भी समाज सेवा का बीड़ा उठाकर इस कार्य का सुन्दर ढंग से निर्वाह किया है। टाबर टोल़ी पाक्षिक तथा कानिया मानिया कुर्र त्रैमासिक जैसे पत्रों में आप दैनन्दिन समाचारों के साथ-साथ उत्कृष्ठ कविताओं, कहानियों व अन्य साहित्यिक प्रकाशन भी करते हें, जिससे नवोदित प्रतिभाओं को राजस्थानी, हिन्दी लेखन का भरपूर अवसर आप उपलब्ध करा रहे हैं। जो कि साहित्यिक उत्थान में एक सार्थक प्रयत्न है। मैंने साहित्य के प्रकाश पुंज श्री दीनदयाल जी के बारे में बहुत सुना, पढ़ा और जाना। परन्तु स्थिति एकदम वैसी ही है जैसी भूषण कवि के समक्ष आयी-
''साहू को सराहौ के सराहौ छत्रसाल को।'

मैं भी किसकी सराहना करूं? जहां इनका साहित्य भावों के भोलेपन से युक्त है वहीं इनके स्वभाव की दृढ़ता मेरे मन को गहराइयों तक स्पर्श करती है। श्री शर्मा जी सिर्फ लिखते नहीं, उसे जीते हैं। सिर्फ छूते नहीं महसूस करते हैं। सिर्फ देखते नहीं गौर करते हैं। सदा मुस्कुराना और सबको प्यार करना, गुणीजन का सम्मान पाना, बच्चों के दिल में रहना और सच्चे आलोचकों की स्वीकृति पाना, आदि बातें आपके स्वभाव में शामिल हैं। साथ ही आप खूबसूरती की सराहना करते हैं दूसरों में खूबियां तलाशते हैं और बिना किसी उम्मीद के दूसरों के लिए खुद को अर्पित कर देते हैं। आपके इन्हीं गुणों के बारे में सोचकर मेरा अन्र्तमन आलोकित हो उठता है। मां सरस्वती की कृपा आप पर हमेशा यूं ही बनी रहे तथा आप अपने अनुभव, चिन्तन आत्मीयता और समर्पण से बाल साहित्य जगत को अपनी लेखनी द्वारा समृद्ध करते रहें तथा आपका आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ बना रहे। इसी आशा और आपके सुदीर्घ स्वस्थ जीवन की मंगलकामनाओं के साथ। 

- कृष्णा जांगिड़ 'कीर्ति', जसाना
दिनांक :  5/03/2010

Wednesday, July 21, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -22

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी : 
दीनदयाल शर्मा

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचन्द या टालस्टाय के बारे में 'कुछ' लिखना बड़ा आसान लगता है। क्योंकि उनके द्वारा लिखे गए के अलावा उनके बारे में लिखा गया भी बहुत पढ़ा जा चुका है। पर किसी उस व्यक्ति के बारे में लिखा हुआ कम पढ़ा गया हो पर हो वह सुपरिचित। अब यह समझ में ही नहीं आ रहा कि श्री दीनदयाल शर्मा को क्या माना जाए?बाल साहित्यकार, साहित्यकार, कवि, हँसोड़, पत्रकार या फिर केवल मित्र। यह निर्णय कर पाना काफी कठिन है कि उनका कौनसा रूप उल्लेखनीय है या वे हरफनमौला हैं। कुछ भी हो, उन्हें यदि साहित्य का आमिर खान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हिन्दी फिल्म  जगत ज्यादातर अभिनेता कद में लम्बे हैं, पर कद में छोटा होने पर भी आमिर खान अभिनय में कइयों से ऊंचे हैं। इसी तरह सामान्य कद काठी के श्री दीनदयाल शर्मा भीड़ में चाहे छिप जाएं, पर साहित्य जगत में अपना कद काफी ऊंचा कर चुके हैं। यहां उन्हें छिपाना अब संभव नहीं है।

उनके परिचय का दायरा भी लम्बा-चौड़ा है। देश में कहीं भी जाएं, जहां दो-चार कवि, लेखक जुड़ेगे, इनके परिचित मिल ही जाएंगे। कुछ साल पहले उदयपुर में एक सज्जन मिले। परिचय हुआ। उन्हें बताया कि संगरिया हनुमानगढ़ जिले में हैं तो वे चहके-हनुमानगढ़ में तो एक वे हैं जो डुक मार कर हँसाते हैं...दीनदयाल जी..।

दुनियाभर में पहलवान दूसरे को रुलाने के लिए घंूसा मारते हैं। एक दीनदयाल शर्मा ही हैं, जो दूसरों को हँसाने के लिए घूंसे  या राजस्थानी 'डुक' मारते हैं। कहने का मतलब है कि मंच से जिसने भी इनकी राजस्थानी कविताएं सुन ली हैं, वह इन्हें भूल नहीं सकते। अभी कुछ दिन पहले अलवर के श्री सुमतिकुमार जैन से बात हुई तो बोले आपके हनुमानगढ़ में तो हमारे परिचित हैं...। वे आगे कुछ बोले, इससे पहले ही मेरे मुँह से निकल गया-दीनदयाल शर्मा...। 

हां, बिल्कुल यही....।

जो वे बताने जा रहे थे। कभी-कभी लगता है हनुमानगढ़ को प्रसिद्धि भटनेर या घग्घर से नहीं बल्कि श्री दीनदयाल शर्मा से ज्यादा मिली है। अनजान व्यक्तियों से भी उन्हें सहजता से बात करते, उनसे घुलते-मिलते देखा गया है। गाड़ी में, बस में...खाली रस्मी परिचय नहीं, रचनात्मक। एक बार गाड़ी में उनके साथ स$फर करते हुए देखा कि अपरिचित से परिचित होते ही उन्होंने उसके हाथ में अपनी कोई किताब या टाबर टोल़ी का नया अंक थमा दिया। इस हिदायत के साथ कि खुद भी पढऩा और बच्चों को भी पढ़ाना। यदि दीनदयाल के बस्ते में दो किताब है तो समझिए, किताबें कैद में नहीं रहेंगी। उन्हें पाठक मिलेंगे। मेरे जैसे व्यक्ति के साथ श्री दीनदयाल बैठते हैं तो कितना अजीब लगता होगा। क्योंकि मैं किताबें बांटने में जितना कंजूस हूँ , वे उतने ही उदार।

जब भी किसी लेखक के बारे में अखबार में कोई सुसमाचार छपे और सुबह-सुबह ही लेखक, को 'मैसेज' का संकेत मिले तो सब समझ जाते हैं कि श्री दीनदयाल का बधाई संदेश है। इसलिए मजाक में यही कहा जाता है कि श्री दीनदयाल शर्मा रात में सोने से पहले 'अगले दिन' का दैनिक पढ़ लेते हैं और जागते ही मुँह धोने से पहले बधाई का एस.एम.एस. भेज देते हैं। इनकी यह सजगता और तत्परता लेखक और अ$खबार दोनों को निहाल कर देती है।

श्री दीनदयाल शर्मा को अभी तक टीवी के लाफ्टर शो में जाने का अवसर नहीं मिला है। इसलिए वे हमें और आपको हँसा कर अपनी इस कला का प्रदर्शन करते रहते हैं। अखबार में वर्गीकृत विज्ञापन की तरह वर्गीकृत लतीफों का भी उनके पास भंडार है। जैसे आप हैं, वैसा ही लतीफाबाण आपकी ओर आता दिखाई देगा। आपको नाक-भौं सिकोडऩे का मौका नहीं देंगे कि आप कहें-यह क्या सुना दिया। मर्यादा ही भंग कर दी। यही कारण है कि लड़कियों के कॉलेज में भी कन्याओं का मनोरंजन करने बुला लिए जाते हैं। स्टाफ निश्चित रहता है कि सीमारेखा का उल्लंघन नहीं होगा। आजकल तो पता नहीं, पहले तो $खुद दीनदयाल ही इसकी व्यवस्था करते थे। जब लड़कियों, महिलाओं की सभा में हास्य बिखेरने जाते थे, तब अद्र्धांगिनी श्रीमती कमलेश शर्मा को साथ ले जाते ताकि नियंत्रित रहें। ऐसा बताकर वे सरलता से स्वीकार करते रहे हैं कि उन पर बीवी का कंट्रोल है।

खैर, यह तो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की बात है। यदि उनके कृतित्व पर दृष्टिपात करें तो वह भी कम नहीं है। उनकी 'मैं उल्लू हूँ ' यह उनकी स्वीकारोक्ति नहीं, उनके व्यंग्य संग्रह का शीर्षक है। उनके व्यंग्य लेखन का पुख्ता प्रमाण है। बाल साहित्य में उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके कई बाल कथा संग्रह तो तभी छप गए थे जब आज के कई साहित्यकार शैशवास्था में थे। कवि के रूप में तो यही कहा जाएगा कि आज तक किसी मंच पर असफल नहीं हुए हैं। उनके लिए आमतौर पर 'एक और'... 'एक और'.... सुनाई देता है। क्षेत्र के कई साहित्यकारों को 'प्रकाशित' होने में उन्होंने संपादन-प्रकाशन मार्ग निर्देशन के क्षेत्र में अभूतपूर्व सहयोग दिया है। इनकी वजह से कइयों के हाथ में उनकी प्रकाशित कृतियां हैं। पर पत्रकारिता के क्षेत्र में टाबर टोल़ी उनका अभिनव प्रयोग है। 

राजस्थान से बाहर हिन्दी क्षेत्रों में उनके पाक्षिक का नाम कइयों को भ्रमित कर देता है, पर मैटर उन्हें हर्षित करता है। साहित्य और बाल साहित्य से जुड़े इस पाक्षिक को उनके धैर्य का प्रतीक कहा सकता है। गत सात वर्षों से निरंतर नियमित प्रकाशन, संपादन... वह भी साधन विहीनता की स्थिति में आश्चर्यचकित तो करता ही है। इसी उत्साह ने उन्हें एक बार कानिया मानिया कुर्र..नाम से राजस्थानी बाल अख़बार प्रकाशित करने की प्रेरणा हुई। पर तीनेक साल से आगे यह गाड़ी नहीं चली। काश...राजस्थानी अभियान के नेता आगे आते और एक नये नवेले राजस्थानी बाल अखबार को मरने न देते। खैर, कुछ भी हो, जीवन में अक्सर झंझावतों का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए, उनकी यह जिजीविषा बनी रहे, यही कामना है।                        

गोविंद शर्मा,  ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राजस्थान
1-15 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार "टाबर टोळी " से साभार

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -21


बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर : 
श्री दीनदयाल शर्मा

कभी-कभी मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि हमारे बीच के ही कुछ साहित्यकार इस बात से चिंतित दिखाई देते हैं कि बच्चों के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध लेखक प्राय: नहीं लिख रहे हैं, यह बात बाल साहित्य के लिए अच्छी नहीं है। या फिर बड़ों के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते, इस कारण बाल साहित्य में स्तरीय रचनाओं का अभाव हो गया है। 

मुझे लगता है ऐसा है नहीं। यह बहुत सीमित सोच की उपज लगती है। अमुक लेखक बड़े हैं, बड़ा नाम है लेकिन बच्चों के लिए नहीं लिखते। ऐसे तथ्य ही बाल-साहित्य को हतोत्साहित करने को काफी हैं। 

एक कारण और मेरी समझ से यह भी है कि बाल साहित्य पर गंभीर रूप से, संजीदगी के साथ समीक्षात्मक कार्य न हो पाने के कारण बाल साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएं साहित्य-प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय नहीं बन पाती हैं। शायद इसीलिए हमारे कुछ बौद्धिक साहित्यिक मित्रों, लोगों को लगता है कि देश में बाल-साहित्य सर्जकों की कमी है, या फिर श्रेष्ठ बाल साहित्य अब नहीं रचा जा रहा। यह तो निराशावादी दृष्टि है। 

साथ ही मेरा यह भी मानना  है कि हर लेखक बाल-साहित्य लिख ही नहीं सकता। बच्चों के लिए लिखने में बच्चों जैसा मन प्राप्त करना पहली शर्त है। 

आप बड़ों के मन को भले ही टटोल लेंगे कि भीतर क्या चल रहा है? लेकिन बच्चों के मन की थाह पा लेना आसान नहीं। उनका कल्पना संसार बड़ा अद्भुत है। मौलिक भी है। बच्चों के मन को बांचने, फिर उसे बांध लेने का कौशल प्रदर्शित करना सिद्धहस्त साहित्यकार के लिए ही सम्भव है। ऐसा साहित्यकार ही समय की नब्ज़ को पहचानने और उसी अनुरूप अपनी लेखनी में भी बदलाव कर लेता है। पुराने और नए के बीच सामंजस्य भी बना लेता है। यह प्रसन्नता की ही बात है कि जिन बाल साहित्यकारों ने इस बदलाव को समझ लिया है, उनमें देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार दीनदयाल शर्मा भी शामिल है। श्री शर्मा ने हिन्दी साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं में लेखन किया है। अनेक पुस्तकों का संपादन भी इन्होंने किया है। चूंकि स्वयं मन से सरल, सरस, खुश मिज़ाज व्यक्ति हैं इसलिए बाल-साहित्य भी रचते रहे हैं। अपनी रचनाओं में हास्य के रंग भी बिखेरते रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इनका लेखन नियमित रहता है। बाल साहित्य संबंधी गोष्ठियों में भी इनकी जीवंत उपस्थिति दूर-दूर तक रहती है। जैसा सीधा-सादा व्यक्ति है वैसा ही सीधा-सादा व्यक्तित्व। इनकी रचनाओं में नाना प्रकार के भाव एवं आस्वाद सहज रूप से देखने को मिलता है। कोई बौद्धिक लठैतपना नहीं, कोई पांडित्य भी नहीं। सहज, मन का स्पर्श करती हुई लेखनी। 

श्री दीनदयाल शर्मा बाल साहित्य को हर तरह से प्रासंगिक बनाने के अपने संकल्प में हर तरह से समर्पित दिखाई देने वाले साहित्यकार हैं। वे देश के एक महत्वपूर्ण बाल साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान तेज़ी से बनाते जा रहे हैं तो मेरे ख्याल से इसके पीछे है- इनकी तर्क दृष्टि। इन्होंने यह अच्छी तरह से समझ लिया है कि अब सन् साठ के बच्चों के लिए नहीं, बल्कि आज के उन बच्चों के लिए लिखना है जो वर्तमान के हमारे जीवन, समाज, संस्कृति, राजनीति, अपराध आदि से अनभिज्ञ नहीं हैं। वे कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले बच्चे हैं। इनके अपने सपने हैं, अपनी अभिलाषाएं हैं, अपनी समस्याएं हैं और जो उनके पालनहारों से काफी भिन्न है। 

इसलिए वर्तमान की कटु सच्चाइयों के समाधान बताने वाली, जीवन में उत्साह, सकारात्मक सोच देने वाली रचनाएं लेकर ही बाल पाठकों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए बच्चों को स्वस्थ दिशा-निर्देश देना होगा-उपदेश से नहीं, उनके अपने जीवन और आस-पास के घटते घटनाचक्र के माध्यम से। 

मुझे सदैव इस बात की भी प्रसन्नता रही है कि श्री दीनदयाल शर्मा ने अपने बाल-साहित्य में मनोरंजन और विज्ञान के साथ-साथ सीख और परंपरा को नकारा नहीं है, बल्कि इन सबका सम्मान, स्वीकारोक्ति भाव से, समुचित व परस्पर सामंजस्य बनाए हुए वे बाल साहित्य की रचना कर रहे हैं। मेरी दृष्टि में यह एक बहुत बड़ी बात है। इसलिए भी कि जब महानगर की सीमेंट-कंक्रीट वाली संस्कृति से जुड़े बाल-साहित्यकार के लेखन में से वे विषय तेज़ी से आगे बढऩे के चक्कर में पीछे छूटते जा रहे हैं, जिनमें शामिल है हमारे खेत-खलिहान, गांव, कस्बे, छोटे शहर, समाज, घर-परिवार। दीनदयाल शर्मा अपनी रचनाओं में इन्हें भी साथ लेकर चलते हैं। 

हनुमानगढ़ निवासी कलम का यह सिपाही आज देश में बाल साहित्य का सशक्त हस्ताक्षर है। इस प्यारे इन्सान, संजीदा और बच्चों-बड़ों में समान लोकप्रिय साहित्यकार की लेखनी से उपजी रचनाएं इसी प्रकार हमें मिलती रहेंगी, ऐसी आशा है। हिंदी व राजस्थानी में समानांतर लेखन वाले, अनेक पुस्तकों के रचयिता दीनदयाल शर्मा की कलम को मेरा भी सलाम पहुंचे। हार्दिक शुभकामनाएं। 

-सुधीर सक्सेना 'सुधि'
75/44, शिप्रा पथ, 
मानसरोवर, जयपुर



1-15 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार "टाबर टोळी " से साभार




Saturday, July 17, 2010

दीनदयाल शर्मा : आपकी नज़र में -20


बाल साहित्य के क्षेत्र में 
विशिष्ट स्थान रखते हैं दीनदयाल शर्मा

हिन्दी एवं राजस्थानी बाल साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं श्री दीनदयाल शर्मा। हिन्दी राजस्थानी भाषा में आपकी अनेक कृतियां प्रकाशित हैं। कुछ रचनाओं का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। 

बाल साहित्य के अलावा  कविता, नाटक, कथा, हास्य व्यंग्य आदि अनेक विधाओं पर आपने कलम चलाई है। आपके लिखे कई नाटक विभिन्न शहरों-गांवों में मंचित हुए हैं, वहीं आकाशवाणी से राज्य स्तर पर समय-समय पर प्रसारित हुए हैं। पगली, मुझे माफ कर दो, उसकी सजा आदि नाटक सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष करते हैं। साथ ही समाज को एक संदेश भी देते हैं। 

हास्य रचनाओं में आपके 'सेन्स ऑफ ह्यूमर' का पता चलता है। दैनंदिन बातों मं से हास्य निकालने में आपको महारत हासिल है। आपकी हास्य रचनाओं को पढ़कर या सुनकर कोई बिना हंसे या मुस्कुराए रह ही नहीं सकता। आपके व्यंग्य इतने तीखे एवं सटीक होते हैं कि व्यक्ति सोचने पर मजबूर हो जाता है। कोई भी घटना जिस पर व्यंग्य किया जा सकता है, आपकी नज़र से बच नहीं पाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, प्रशासन, व्यापार जहां भी आपको अनुचित कार्य होता दिखाई देता है, आपकी कलम उस पर तुरंत कटाक्ष करती है। 

लेकिन बाल साहित्य में आपकी विशेष रूचि है। आपने बाल साहित्य में संपूर्ण भारत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में पहला पाक्षिक अ$खबार 'टाबर टोल़ी' को आरंभ करवाने का श्रेय भी आपको ही हासिल है। आप इस बाल पत्र के मानद संपादक हैं। इस पाक्षिक बाल अखबार में आप बहुत ही ज्ञानोपयोगी जानकारी उपलब्ध करवाकर बच्चों में अच्छे संस्कार डालने एवं साहित्य के प्रति रूचि बढ़ाने का अति महत्त्वपूर्ण कार्य करने में लगे हुए हैं। जिसकी जितनी सराहना की जाए, कम है। आपने 'टाबर टोल़ी' को झोंपड़ी से लेकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाया है। दो- दो राष्ट्रपतियों से मुलाकात करना और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम द्वारा 2005 में आपकी किताब 'द ड्रीम्स' का लोकार्पण करना .....यह सौभाग्य किसी विरले लेखक को ही मिलता है। 

साहित्य सृजन के साथ-साथ पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियां भी आप बखूबी निभा रहे हैं। आपके भीतर बैठा कलाकार सिर्फ विद्यालय तक ही कैसे सीमित रह सकता है। आप अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं में पदाधिकारी हैं। साथ ही आप नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए नियमित रूप से संगोष्ठियां, पुस्तक चर्चा व कविता पाठ जैसे  आयोजन भी समय-समय पर करते हुए साहित्य सेवा में रत हैं। आप आकाशवाणी  व दूरदर्शन पर अपनी रचनाओं को पेश कर श्रोता/दर्शकों को लाभान्वित करते रहते हैं। 

बाल  साहित्य में आपकी रूचि एवं इस क्षेत्र में आपके कार्यों के कारण आप भारत के बाल साहित्यकारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। आपको विभिन्न संस्थाओं एवं अकादमियों द्वारा समय-समय पर सम्मानित एवं पुरस्कृत किया है। जो आपकी साहित्यिक सेवा का ही फल है। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

अर्जुनदान चारण, 
सहायक वन संरक्षक,
फलौदी, जिला: जोधपुर, राज.
मोबाइल : 09414482882

16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार टाबर टोळी से साभार