'टाबर टोल़ी' का अंक जब-जब पढऩे का सौभाग्य मिला......मैं श्री दीनदयाल शर्मा द्वारा लिखित रचना या कॉलम ढंूढ़ता रहा। आओ सीखें : शुद्ध लेखन हो या समीक्षा, लेख हो या कविता, हिन्दी में हो या राजस्थानी में....वे प्रभावी लिखते हैं और पाठक पर छाप छोडऩे वाला लेखन करते हैं। बच्चों के लिए तो वे निरन्तर लिखते रहे हैं और सम्मानित-पुरस्कृत होते रहे हैं। यह एक गौरवपूर्ण बात हैं वे इस तन्मयता से सृजनरत हैं और साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे हैं।
'टाबर टोल़ी' के माध्यम से नया कीर्तिमान रचा है। अपनी संपादकीय सूझबूझ से उन्होंने अनेकानेक लेखकों-कवियों को जोड़ा है और विपुल साहित्य प्रस्तुत किया है। एक बाल-पत्र को नियमितता देकर राज्य में बाल साहित्य के रचनाकारों को मंच प्रदान किया है।
इतनी-इतनी उपलब्धियों के बाद भी वे विनम्र हैं, समर्पित हैं एवं आदर्श हैं। बाल साहित्य में उनका नाम सम्मान के साथ जुड़ा है। देशभर में अपनी पहचान बनाने वाले श्री दीनदयाल शर्मा उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ रहे हैं। पर, अकेले नहीं, कई रचनाधर्मी मित्रों को साथ लेकर।
एक तथ्य जो मैंने महसूस किया वे जोड़ तोड़ से ऊपर हैं। कोई भी रचनाकार हो, उसे उचित सम्मान देते हैं चाहे परिचित हो या न हो। खेमेबाजी से दूर रह कर ही वे इतना कुछ श्रेष्ठ कर पाये हैं। उनकी पुस्तकों पर मेरे अन्य मित्रों ने विस्तार से चर्चा की है। वे नि:संदेह प्रशंसा के योग्य हैं। अनेक शुभकामनाएं ऐसे रचनाकार के लिए।
-डॉ.विनोद सोमानी 'हंस',
42/43, जीवन विहार कॉलोनी,
आना सागर सरक्यूलर रोड,
अजमेर-305004, राज.
दूरभाष : 0145-2627479
16 अप्रैल, 2010 के बच्चों के अखबार 'टाबर टोल़ी' से साभार
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